छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 517, कुल 978 में से
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| शब्द उपकरणेषु स्त्रियोऽन्नं पशवोऽन्नं विशोऽन्नं राज्ञामित्यादि। न च तेषां स्त्र्यादीनां पुरुषोपभोग्यत्वेऽप्युपभोगो नास्ति। तस्मात्कर्मिणो देवा- | शब्दका उपकरणोंमें भी प्रयोग देखा ही जाता है; जैसे 'राजाओंका स्त्रियाँ अन्न हैं, पशु अन्न हैं, वैश्य अन्न हैं' इत्यादि। पुरुषके उपभोग्य होनेपर भी उन स्त्री आदिको उपभोग प्राप्त न होते हों--ऐसी बात नहीं है। अतः कर्मी लोग देवताओंके |
| नामुपभोग्या अपि सन्तः सुखिनो देवैः क्रीडन्ति। शरीरं च तेषां सुखोपभोगयोग्यं | उपभोग्य होनेपर भी सुखी होकर देवताओंके साथ क्रीडा करते हैं। तथा उनका सुखोपभोगयोग्य जलीय |
| चन्द्रमण्डल आप्यमारभ्यते। तदुक्तं पुरस्तात्-श्रद्धाशब्दा आपो द्युलोकाग्नौ हुताः सोमो राजा संभवतीति। | शरीर चन्द्रमण्डलमें आरम्भ होता है। पहले यह बात कही भी जा चुकी है कि 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जलका द्युलोकरूप अग्निमें हवन किये जानेपर सोम राजाकी उत्पत्ति होती है। |
| ता आपः कर्मसमवायिन्य इतरैश्च भूतैरनुगता द्युलोकं प्राप्य चन्द्रत्वमापन्नाः शरीराद्यारम्भिका इष्टाद्युपासकानां भवन्ति। अन्त्यायां च शरीराहुतावग्नौ हुतायामग्निना दह्यमाने शरीरे तदुत्था आपो धूमेन सहोर्ध्वं यजमानमावेष्ट्य चन्द्रमण्डलं प्राप्य-कुशमृत्तिकास्थानीया बाह्य- | वह कर्मसम्बन्धी जल अन्य भूतोंसे अनुगत हो द्युलोकमें पहुँचकर चन्द्रभावको प्राप्त हो इष्टादि कर्मोंकी उपासना करनेवाले पुरुषोंके शरीरादिका आरम्भ करनेवाला होता है। फिर शरीररूप अन्तिम आहुतिके हुत होनेपर जब अग्निद्वारा शरीर दग्ध होने लगता है तो उससे उत्पन्न होनेवाला जल धूमके साथ यजमानको आच्छादित कर ऊपर चन्द्रमण्डलमें पहुँचकर कुश एवं |