भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 518
५१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| ह्यशरीरारम्भका भवन्ति । तदारब्धेन च शरीरेणेष्टादिफलमुपभुञ्जाना आस्ते ॥ ४ ॥ | मृत्तिकास्थानीय बाह्य शरीरका आरम्भ करनेवाला होता है । उससे आरम्भ हुए शरीरसे ही वे इष्टादि कर्मोंका फल भोगते हुए वहाँ रहते हैं ॥ ४ ॥ |

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द्वितीय प्रश्नका उत्तर

( पुनरावर्तनका क्रम )

तस्मिन्यावत्संपातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाभ्रं भवति ॥ ५ ॥

वहाँ कर्मोंका क्षय होनेतक रहकर वे फिर इसी मार्गसे जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं । [ वे पहले ] आकाशको प्राप्त होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर वे धूम होते हैं और धूम होकर अभ्र होते हैं ॥ ५ ॥

यावत्तदुपभोगनिमित्तस्य कर्मणः क्षयः, संपतन्ति येनेति संपातः कर्मणः क्षयो यावत्संपातं यावत्कर्मणः क्षय इत्यर्थः; तावत्तस्मिंश्चन्द्रमण्डल उषित्वाथानन्तरमेतमेव वक्ष्यमाणमध्वानं मार्गं पुनर्निवर्तन्ते । पुनर्निवर्तन्त इति प्रयोगात्पूर्वमप्यसकृच्चन्द्रमण्डलंजबतक उस चन्द्रलोकके उपभोगोंके निमित्तभूत कर्मका क्षय होता है—जिसके द्वारा सम्पतन होता है उसे सम्पात अर्थात् कर्मका क्षय कहते हैं, यावत्सम्पात अर्थात् जबतक कर्मका क्षय होता है तबतक उस चन्द्रमण्डलमें निवासकर उसके पश्चात् इस आगे कहे जानेवाले मार्गमें ही फिर लौट आते हैं । 'पुनर्निवर्तन्ते' (फिर लौट आते हैं) ऐसा प्रयोग होनेसे यह जाना जाता है कि पहले भी कई बार चन्द्र-