छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 519, कुल 978 में से
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| गता निवृत्ताश्चासन्निति गम्यते।<br><br>तस्मादिह लोकं इष्टादिकर्मोपचित्य चन्द्रं गच्छन्ति, तत्क्षये चावर्तन्ते; क्षणमात्रमपि तत्र स्थातुं न लभ्यते, स्थितिनिमित्तकर्मक्षयात्, स्नेहक्षयादिव प्रदीपस्य।<br><br>तत्र किं (कर्मक्षयस्य सावशेषत्वं निरवशेषत्वं वा ? सावशेष इति।) येन कर्मणा चन्द्रमण्डलमारूढस्तस्य सर्वस्य क्षये तस्मादवरोहति किं वा सावशेष इति।<br><br>किं ततः ?<br><br>यदि सर्वस्यैव क्षयः कर्मणश्चन्द्रमण्डलस्थस्यैव मोक्षः प्राप्नोति, तिष्ठतु तावत्तत्रैव मोक्षः स्यान्न वेति, तत आगतस्येहं शरीरोपभोगादि न संभवति। | मण्डलको प्राप्त होकर लौट चुके हैं; अतः वे इस लोकमें इष्टादि कर्म करके चन्द्रमण्डलको प्राप्त होते हैं; तथा उनका क्षय होनेपर फिर लौट आते हैं। उस समय वहाँकी स्थितिके निमित्तभूत कर्मोंका क्षय हो जानेके कारण उस स्थानपर उनका एक क्षण भी ठहरना नहीं हो सकता, जिस प्रकार कि तैलका क्षय हो जानेपर दीपक नहीं ठहर सकता।<br><br>**पूर्व०—**जिस कर्मके द्वारा वह चन्द्रमण्डलपर आरूढ होता है क्या उस सबका क्षय होनेपर वह उससे उतरता है अथवा कुछ शेष रह जानेपर ही उतर आता है ?<br><br>**सिद्धान्ती—**इससे तुम्हें क्या लेना है ?<br><br>**पूर्व०—**यदि सारे ही कर्मका क्षय हो जाता है तो चन्द्रमण्डलमें रहते हुए ही उसका मोक्ष सिद्ध हो जाता है, और 'वहाँ रहते हुए ही मोक्ष होता है या नहीं होता' इस विचारको रहने भी दिया जाय तो भी वहाँसे आनेपर इस लोकमें उसके शरीरोपभोग आदि सम्भव नहीं हो सकते तथा |
छा० उ० १७—