भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 521, कुल 978 में से

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पृष्ठ 521

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
रादिप्राप्तानां चात्यन्तमूढानामुत्कर्षहेतोः कर्मण आरम्भकत्वासंभवात् । गर्भभूतानां च स्रंसमानानां कर्मासंभवे संसारानुपपत्तिः । तस्मान्नैकस्मिञ्जन्मनि सर्वेषां कर्मणामुपभोगः ।जो स्थावरादि योनियोंको प्राप्त हुए अत्यन्त मूढ़ जीव हैं उनके उत्कर्षके हेतुभूत कर्मोंका आरम्भकत्व तो असम्भव ही है । [ इसके सिवा कोई-कोई ऐसा भी समझने लगेंगे कि ] गर्भरूप होकर क्षीण हुए जीवोंके कोई कर्म न होनेके कारण उन्हें संसारकी प्राप्ति होना ही असम्भव है । अतः एक ही जन्ममें समस्त कर्मोंका उपभोग नहीं हो सकता ।
यत्तु कैश्चिदुच्यते सर्वकर्माश्रयोपमर्देन प्रायेण कर्मणां जन्मारम्भकत्वम् । तत्र कानिचित्कर्माण्यनारम्भकत्वेनैव तिष्ठन्ति कानिचिज्जन्मारभन्त इति नोपपद्यते; मरणस्य सर्वकर्माभिव्यञ्जकत्वात्स्वगोचराभिव्यञ्जकप्रदीपवदिति । तदसत् सर्वस्य सर्वात्मकत्वाभ्युपगमात् ।कुछ लोगोंका जो ऐसा कथन है कि ‘[ संचित- ] कर्म प्रायः सम्पूर्ण [ प्रारब्ध ] कर्मोंके आश्रय [ शरीर ] का नाश करके जन्मके आरम्भक होते हैं; उस अवस्थामें कुछ कर्म तो जन्मके अनारम्भकरूपसे ही स्थित रहते हैं और कुछ जन्मका आरम्भ करते हैं-- यह बात सम्भव नहीं है, क्योंकि मरण तो अपने विषयके अभिव्यञ्जक दीपकके समान सारे ही कर्मोंका अभिव्यञ्जक है ?’-- सो उनका यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि [ मधुब्राह्मणमें ] सबका सर्वात्मकत्व स्वीकार किया गया