छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 522, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें५१८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५
| न हि सर्वस्य सर्वात्मकत्वे देशकालनिमित्णावरुद्धत्वात्सर्वात्मनोपमर्दः कस्यचित्क्वचिदभिव्यक्तिर्वा सर्वात्मनोपपद्यते। तथा कर्मणामपि साश्रयाणां भवेत्।<br><br>यथा च पूर्वानुभूतममुष्यमयूरमर्कटादिजन्मभिरभिसंस्कृता विरुद्धानेकवासना मर्कटत्वप्रापकेन कर्मणा मर्कटजन्मारभमाणेण नोपमृद्यन्ते तथा कर्माण्यप्यन्यजन्मप्राप्तिनिमित्तानि नोपमृद्यन्त इति युक्तम्। यदि हि सर्वाः पूर्वजन्मानुभववासना उपमृद्येरन्मर्कटजन्मनिमित्तेन कर्मणा मर्कटजन्मन्यारब्धे मर्कटस्य जात- | है*। अतः सबका सर्वात्मकत्व होनेपर देश, काल और निमित्तसे अवरुद्ध होनेके कारण किसी पदार्थका सर्वथा नाश अथवा सर्वथा अभिव्यक्ति कभी नहीं हो सकती। ऐसा ही कर्म और उनके आश्रयके विषयमें भी होगा [अर्थात् उनका भी सर्वथा नाश अथवा सर्वथा आविर्भाव नहीं हो सकता]।<br><br>जिस प्रकार पहले अनुभव किये हुए मनुष्य, मयूर एवं वानर आदि जन्मोंमें सम्पादित की हुई अनेकों विरुद्ध वासनाएँ वानरत्वकी प्राप्ति करानेवाले वानरजन्मके आरम्भक कर्मसे क्षीण नहीं होतीं उसी प्रकार अन्य जन्मोंकी प्राप्तिके निमित्तभूत कर्म भी क्षीण नहीं होते—यह ठीक ही है। यदि वानरजन्मके निमित्तभूत कर्मसे पूर्वजन्मोंके अनुभवकी समस्त वासनाएँ क्षीण हो जातीं तो वानरजन्मका आरम्भ होनेपर तत्काल उत्पन्न हुए वानरको माताके |
* इसका तात्पर्य यह है कि समस्त पदार्थोंमें न्यूनाधिकरूपसे सभीकी सत्ता रहती है। प्रत्येक पदार्थकी अभिव्यक्ति और विनाशके कारण भी भिन्न-भिन्न हैं। अतः एक व्यक्तिकी मृत्यु किन्हीं-किन्हीं संचित कर्मोंकी अभिव्यञ्जक होनेपर भी सबकी अभिव्यक्ति नहीं कर सकती। इसलिये शेष कर्म अपने उपयुक्त अभिव्यञ्जक निमित्तकी प्राप्तितक फलोन्मुख नहीं होते और न वे आगामी जन्मके आरम्भक ही होते हैं।