भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 978 में से

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पृष्ठ 523

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१९


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
मात्रस्य मातुः शाखायाः शाखान्तरगमने मातुरुदरसंलग्नत्वादिकौशलं न प्राप्नोति, इह जन्मन्यनभ्यस्तत्वात्; न चातीतानन्तरजन्मनि मर्कटत्वमेवासीत्तस्येति शक्यं वक्तुम्, “तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च” ( बृ० उ० ४ । ४ । २ ) इति श्रुतेः। तस्माद्वासनावन्नाशेषकर्मोपमर्द इति शेष-कर्मसंभवः । यत एवं तस्माच्छेषेणोपभुक्तात्कर्मणः संसार उपपद्यत इति न कश्चिद्विरोधः ।एक शाखासे दूसरी शाखापर जाते समय उसके पेटसे चिपके रहने आदिकी कुशलता प्राप्त न होती; क्योंकि इस जन्ममें तो उसका अभ्यास हुआ नहीं और ऐसा भी कहा नहीं जा सकता कि इसके पूर्ववर्ती जन्ममें भी उसे वानरत्व ही प्राप्त था । “विद्या और कर्म उसका अनुगमन करते हैं तथा पूर्वजन्मकी वासना भी” इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । अतः वासनाके समान समस्त कर्मोंका भी क्षय नहीं हो सकता, इसलिये शेष कर्मोंका रहना सम्भव है । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये उपभुक्त हुए कर्मोंसे बचे हुए कर्मद्वारा संसारकी प्राप्ति होना उचित ही है—इस प्रकार कोई विरोध नहीं आता ।
कोऽसावध्वा यं प्रति निवर्तन्ते?वह कौन मार्ग है जिसके प्रति ये लौटते हैं ?
इत्युच्यते—यथेतं यथागतं निवर्तन्ते ।इसपर श्रुति यह कहती है कि जिस मार्गसे गये थे उसीसे लौटते हैं ।
[गमनागमनक्रमयोर्भेद आक्षेपः]<br>ननु मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमस-**शङ्का—**गमनका क्रम तो इस प्रकार बतलाया गया था कि मासोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होता है, किंतु निवृत्ति इस प्रकार