भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 978 में से

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पृष्ठ 524

५२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी-अनुवाद
मिति गमनक्रम उक्तो न तथा निवृत्तिः। किं तर्हि ? आकाशाद्वायुमित्यादि, कथं यथेतमित्युच्यते?<br><br>नैष दोषः, आकाशप्राप्तेस्तुल्यत्वात्पृथिवीप्राप्तेश्च (तत्परिहारः)। न चात्र यथेतमेवेति नियमोऽनेवंविधमपि निवर्तन्ते पुनर्निवर्तन्त इति तु नियमः। अत उपलक्षणार्थमेतद्यथेतमिति अतो भौतिकमाकाशं तावत्प्रतिपद्यन्ते।नहीं बतलायी जाती। तो कैसे बतलायी जाती है?—आकाशसे वायुको प्राप्त होता है इत्यादि रूपसे बतलायी जाती है; फिर 'जिस मार्गसे गये थे उसीसे लौटते हैं'- ऐसा कैसे कहा जाता है?<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आकाशकी प्राप्ति और पृथिवीकी प्राप्ति ये दोनों दशाओंमें समान हैं। इसके सिवा इसमें ऐसा नियम भी नहीं है कि जिस मार्गसे गये थे उसीसे लौटें, किसी अन्य प्रकार भी लौट ही सकते हैं। नियम तो केवल इतना ही है कि वे फिर लौटते हैं। अतः 'जिस मार्गसे गये थे' इत्यादि कथन केवल उपलक्षणमात्र है। अतः भौतिक आकाशको तो वे प्राप्त होते ही हैं।
यास्तेषां चन्द्रमण्डले शरीरारम्भिका आप आसंस्तास्तेषां तत्रोपभोगनिमित्तानां कर्मणां क्षये विलीयन्ते, घृतसंस्थानमिवाग्निसंयोगे। ता विलीना अन्तरिक्षस्था आकाशभूता इव सूक्ष्माचन्द्रमण्डलमें जो उनके शरीरका आरम्भ करनेवाला जल होता है वह वहाँके उपभोगके निमित्तभूत कर्मोंका क्षय होनेपर विलीन हो जाता है, जिस प्रकार कि अग्निका संयोग होनेपर घृतका पिण्ड विलीन हो जाता है। वह अन्तरिक्षस्थ जल विलीन होकर आकाशभूतके समान सूक्ष्म