भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 978 में से

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पृष्ठ 525

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५२१

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भवन्ति । ता अन्तरिक्षाद्वायुर्भवन्ति । वायुप्रतिष्ठा वायुभूता इतश्चामुतश्चोह्यमानास्ताभिः सह क्षीणकर्मा वायुभूतो भवति ।<br><br>वायुर्भूत्वा ताभिः सहैव धूमो भवति । धूमो भूत्वाभ्रम् अभ्ररणमात्ररूपो भवति ॥ ५ ॥हो जाता है । अन्तरिक्षसे वायुरूप हो जाता है । वह वायुमें स्थित होकर वायुरूप हुआ इधर-उधर ले जाया जाता है तथा उसके ही साथ, जिसके कर्म क्षीण हो गये हैं यह जीव वायुरूप हो जाता है । वायु होकर वह उस जलके सहित ही धूम हो जाता है तथा धूम होकर अभ्र-जलभरणमात्ररूप हो जाता है॥५॥

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अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्तेऽतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥

वह अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है । तब वे जीव इस लोकमें धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उड़द आदि होकर उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त कष्टप्रद है । उस अन्नको जो-जो भक्षण करता है और जो-जो वीर्यसेचन करता है, तद्रूप ही वह जीव हो जाता है ॥ ६ ॥

अभ्रं भूत्वा ततः सेचनसमर्थो मेघो भवति; मेघो भूत्वोन्नतेषु प्रदेशेष्वथ प्रवर्षति; वर्षधारारूपेण शेषकर्मा पततीत्यर्थः । त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिल-अभ्र होकर उसके पश्चात् वह वर्षा करनेमें समर्थ मेघ होता है । फिर मेघ होकर ऊँचे स्थानोंमें वृष्टि करता है अर्थात् कर्मोंके शेष रहनेके कारण वर्षाकी धाराओंके रूपमें गिर जाता है । वे जीव इस लोकमें धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल
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