भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 526
५९२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| माषा इत्येवंप्रकारा जायन्ते । क्षीणकर्मणामनेकत्वाद्वहुवचननिर्देशः । मेघादिषु पूर्वेष्वेकरूपत्वादेकवचननिर्देशः । | और उड़द इत्यादि प्रकारसे उत्पन्न होते हैं। क्षीणकर्मा जीवोंकी अनेकता होनेके कारण यहाँ ['ते जायन्ते' इत्यादि रूपसे] बहुवचनका निर्देश किया गया है; इससे पहले मेघ आदिमें एकरूप होनेके कारण एकवचनका निर्देश हुआ है। | | यस्माद्गिरितटदुर्गनदीसमुद्रारण्यमरुदेशादिसंनिवेशसहस्राणि वर्षधाराभिः पतितानाम्, अतस्तस्माद्धेतोर्वै खलु दुर्निष्प्रपतरं दुर्निष्करणं दुर्निसरणम् । यतो गिरितटादुदकस्रोतसोह्यमाना नदीः प्राप्नुवन्ति, ततः समुद्रं ततो मकरादिभिर्भक्ष्यन्ते; तेऽप्यन्येन; तत्रैव च सह मकरेण समुद्रे विलीनाः समुद्राम्भोभिर्जलधरैराकृष्टाः पुनर्वर्षधाराभिर्मरुदेशे शिलातटे वागम्ये पतितास्तिष्ठन्ति, कदाचिद्व्यालम्मृगादिपीता | क्योंकि वर्षाकी धाराओंद्वारा गिरे हुए जीवोंके पर्वततट दुर्ग, नदी, समुद्र, वन एवं मरुस्थल आदि सहस्रों स्थान हैं, अतः इन सब कारणोंसे उनका यह दुर्निष्प्रपतर—दुर्निष्क्रमण अर्थात् कष्टमय निःसरण है; क्योंकि जलके प्रवाहद्वारा गिरितटसे ले जाये जाते हुए वे (जीव) नदीको प्राप्त होते हैं और उससे समुद्रको; तथा उसके पश्चात् मकरादिसे खाये जाते हैं और वे भी दूसरोंसे भक्षित होते हैं। तथा वहाँ समुद्रमें ही यदि मकरके साथ लीन हो गये तो समुद्रके जलके साथ मेघोंसे आकर्षित होकर फिर वर्षाकी धाराओंद्वारा मरुभूमि, शिलातट अथवा अगम्य स्थानोंमें गिरकर पड़े रहते हैं; कभी सर्प एवं मृगादिसे पी लिये जाते हैं अथवा अन्य |