भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 527

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
भक्षिताश्चान्यैः; तेऽप्यन्यैरित्येवंप्रकाराः परिवर्तेरन्, कदाचिद्भक्ष्येषु जातास्तत्रैव शुष्येरन्; अभक्ष्येष्वपि स्थावरेषु जातानां रेतःसिग्देहसंबन्धो दुर्लभ एव, बहुत्वात्स्थावराणाम् इत्यतो दुर्निष्क्रमगत्वम् ।जीवोंद्वारा भक्षित होते हैं और वे भी किन्हीं अन्य जीवोंद्वारा खा लिये जाते हैं [ इस प्रकार वे अनुशयी जीव परिवर्तित होते रहते हैं ] । कभी अभक्ष्योंमें उत्पन्न होनेपर वे वहीं सूख जाते हैं।* भक्ष्योंमें भी स्थावरोंमें उत्पन्न हुए जीवोंको वीर्यसेचन करनेवाले शरीरका सम्बन्ध प्राप्त होना तो कठिन ही है, क्योंकि स्थावरोंकी संख्या बहुत है। इसलिये अनुशयी जीवका निष्क्रमण दुःखमय ही है।
अथवातोऽस्माद्व्रीहियवादिभावाद्दुर्निष्प्रपतरं दुर्निर्गमतरम् । दुर्निष्प्रपतरमिति तकार एको लुप्तो द्रष्टव्यः । व्रीहियवादिभावो दुर्निष्प्रपतस्तस्मादपि दुर्निष्प्रपतातरेतःसिग्देहसंबन्धो दुर्निष्प्रपततर इत्यर्थः; यस्मादूर्ध्वरेतोभिर्बालैः पुंस्त्वरहितैः स्थविरैर्वा भक्षिता अन्तराले शीर्यन्ते, अनेकत्वादन्नादानाम् । कदाचित्काकतालीयवृत्त्या रेतःसिग्भि-अथवा यों समझो कि इस व्रीहियवादिभावसे जीवका छुटकारा होना बहुत कठिन है। 'दुर्निष्प्रपतरम्' इस पदमें एक तकार लुप्त समझना चाहिये। अतः तात्पर्य यह है कि व्रीहियवादिभाव दुर्निष्प्रपत है और उस दुर्निष्प्रपतसे भी वीर्यसेचन करनेवाले शरीरका सम्बन्ध दुर्निष्प्रपतर है, क्योंकि अन्न भक्षण करनेवाले अनेकों होनेके कारण ऊर्ध्वरेता, बालक, नपुंसक अथवा वृद्ध पुरुषोंद्वारा खाये जानेपर वे पेटके भीतर ही नष्ट हो जाते हैं।* जिस समय काकतालीयन्यायसे वे कभी वीर्यसेचन करनेवाले पुरुषोंद्वारा भक्षित किये

* इन दोनों स्थानोंपर जो जीवके सूखने और नष्ट होनेकी बात कही है, वह वैराग्यवृद्धिके उद्देश्यसे स्वर्गावरोहणकी अतिशय दुःखरूपता प्रदर्शित करनेके लिये है।