छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 529, कुल 978 में से
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| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५२५ |
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| ये त्वन्येऽनुशयिभ्यश्चन्द्रमण्डलमना<br>रुह्यैवापापकर्मभिर्घोरैर्व्रीहियवादिभावं प्रतिपद्यन्ते, न<br>पुनर्मनुष्यादिभावम्, तेषां नानुशयिनासिव । दुर्निष्प्रपतरम् ।<br>कस्मात् ? कर्मणा हि तैर्व्रीहियवादिदेह उपात्त इति तदुपभोगनिमित्तक्षये व्रीह्यादिस्तम्बदेहविनाशे यथाकर्मार्जितं देहान्तरं<br>नवं नवं जलूकावत्संक्रमन्ते<br>सविज्ञाना एव; “सविज्ञानो<br>भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति” (बृ० उ० ४।४।२)<br>इति श्रुत्यन्तरात् । यद्यप्युपसंहृतकरणाः सन्तो देहान्तरं<br>गच्छन्ति तथापि स्वप्नवद्देहान्तरप्राप्तिनिमित्तकर्मोद्भावितवासनाज्ञानेन सविज्ञाना एव देहान्तरं<br>गच्छन्ति, श्रुतिप्रामाण्यात् । | किंतु जो अनुशयि जीवोंसे भिन्न<br>प्राणी अपने घोर पापकर्मोंके कारण<br>चन्द्रमण्डलपर आरूढ हुए बिना ही<br>व्रीहि-यवादि भावको प्राप्त होते हैं,<br>मनुष्यादि भावको प्राप्त नहीं होते,<br>उनका व्रीहि-यवादि भावसे निष्क्रमण<br>होना बहुत कष्टप्रद नहीं है। क्यों<br>नहीं है ? क्योंकि उन्होंने कर्मके<br>कारण ही व्रीहि-यवादि देह प्राप्त किया<br>है; अतः उस उपभोगके निमित्तका<br>क्षय होनेपर व्रीहि आदि स्तम्बदेहका<br>नाश हो जानेके कारण वे जान-बूझकर<br>एक तिनकेसे दूसरे तिनकेपर जानेवाली जोंकके समान अपने कर्मानुसार<br>उपार्जित अन्य नवीन-नवीन शरीरमें<br>विज्ञानयुक्त रहकर ही संक्रमण करते<br>हैं; जैसा कि “वह सविज्ञान<br>होता है और सविज्ञान रहता<br>हुआ ही अन्य शरीरमें संक्रमण<br>करता है” इस अन्य श्रुतिसे भी सिद्ध<br>होता है। यद्यपि जीव इन्द्रियोंका उपसंहार (हृदयमें लय) हो जानेपर ही<br>देहान्तरमें जाते हैं, तथापि इस श्रुतिप्रमाणसे वे स्वप्नके समान देहान्तरकी<br>प्राप्तिके निमित्तभूत कर्मसे उत्पन्न क॑<br>हुई वासनाके विज्ञानसे सविज्ञान हुए<br>ही देहान्तरको प्राप्त होते हैं। |