भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 978 में से

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पृष्ठ 530
५२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृतहिन्दी
तथार्चिरादिना धूमादिना च गमनं स्वप्न इवोद्भूतविज्ञानेन, लब्धवृत्तिकर्मनिमित्तत्वादगमनस्य । न तथानुशयिनां व्रीह्यादिभावेन जातानां सविज्ञानमेव रेतःसिग्योषिद्देहसंबन्ध उपपद्यते, न हि व्रीह्यादिलवनकण्डनपेषणादौ च सविज्ञानानां स्थितिरस्ति ।इसी प्रकार उपासकोंका अर्चि आदि मार्गसे और सकाम कर्मियोंका धूम आदि मार्गसे जो गमन होता है वह भी स्वप्नके समान उद्भूतवासनात्मकविज्ञानसे सविज्ञान हुए जीवोंका ही होता है; क्योंकि वह गमन लब्धवृत्ति (अपना फल देनेके लिये उन्मुख) कर्मके कारण होता है । किंतु व्रीहि यवादिरूपसे उत्पन्न हुए अनुशयी जीवोंका जो वीर्यका आधान करनेवाले पुरुष अथवा स्त्रीके देहोंसे सम्बन्ध होता है वह उनके सविज्ञान रहते हुए ही हो, यह सम्भव नहीं है; क्योंकि व्रीहि आदिके काटने, कूटने अथवा पीसनेमें सविज्ञान जीवोंकी स्थिति नहीं रह सकती ।
ननु चन्द्रमण्डलादप्यवरोहतां इष्टापूर्तादि-लब्धगतेर्दुःखस्वरूपत्वान्नाज्ञानार्थक्यमित्याक्षेपः देहान्तरगमनस्य तुल्यत्वाज्जलूकावत्सविज्ञानतैव युक्ता, तथा सति घोरो नरकानुभव इष्टापूर्तादिकारिणां चन्द्रमण्डलादारभ्य प्राप्तो यावद्ब्राह्मणादिजन्म; तथा च सत्यनर्थायैवेष्टापूर्ताद्युपासनं विहितं स्यात्; श्रुतेश्चाप्रामाण्यं प्राप्तम्, वैदिकानां कर्मणामनर्थानुबन्धित्वात् ।शङ्का—चन्द्रमण्डलसे उतरनेवाले जीवोंका देहान्तरगमन भी वैसा ही होनेके कारण उनकी भी जोंकके समान सविज्ञानता ही माननी उचित है । ऐसा होनेपर इष्ट-पूर्त्त आदि कर्म करनेवालोंको चन्द्रमण्डलसे लेकर जबतक ब्राह्मणादिजन्मकी प्राप्ति होगी तबतक घोर नरकका अनुभव होना सिद्ध होगा । ऐसी अवस्थामें इष्ट-पूर्त्त आदि उपासना अनर्थके लिये ही विहित मानी जायगी और इस प्रकार वैदिक कर्मके अनर्थकारी होनेके कारण श्रुतिकी अप्रामाणिकता सिद्ध होगी ।
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