भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 978 में से

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पृष्ठ 531

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५२७


संस्कृत (मूल/भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
[आक्षेप-परिहारः]<br>न, वृक्षारोहणपतनवद्विशेषसंभवात्। देहाद्देहान्तरं प्रतिपित्सोः कर्मणो लब्धवृत्तित्वात्कर्मणोद्भावितेन विज्ञानेन सविज्ञानत्वं युक्तम्। वृक्षाग्रमारोहत इव फलं जिघृक्षोः, तथार्चिरादिना गच्छतां सविज्ञानत्वं भवेत्; धूमादिना च चन्द्रमण्डलमारुरुक्षताम्। न तथा चन्द्रमण्डलादवरुरुक्षतां वृक्षाग्रादिव पततां सचेतनत्वम्।**समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वृक्षपर चढ़ने और उससे गिरनेके समान इन अवस्थाओंमें अन्तर रहना सम्भव है। एक देहसे दूसरे देहको प्राप्त करानेकी इच्छावाले कर्म लब्धवृत्ति होनेके कारण उन कर्मोंद्वारा उत्पन्न किये हुए विज्ञानसे उस जीवका सविज्ञान रहना उचित है। फल लेनेकी इच्छासे वृक्षपर चढ़नेवाले मनुष्यकी जिस प्रकार सविज्ञानता सम्भव है, इसी प्रकार अर्चिरादि मार्गसे जानेवाले तथा धूमादि मार्गसे चन्द्रमण्डलपर आरूढ़ होनेवाले जीवोंकी भी सविज्ञानता सम्भव है। किंतु इसी तरह वृक्षाग्रसे गिरनेवाले पुरुषोंके समान चन्द्रमण्डलसे गिरनेवालोंकी सचेतनता सम्भव नहीं है।
यथा च मुद्गराद्यभिहतानां तदभिघातवेदनानिमित्तसंमूर्च्छितप्रतिबद्धकरणानां स्वदेहेनैव देशाद्देशान्तरं नीयमानानां विज्ञानशून्यता दृष्टा, तथा चन्द्रमण्डलान्मानुषादिदेहान्तरं प्रत्य-जिस प्रकार कि मुद्गरादिसे आहत पुरुष जिनकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ उनके आघातोंकी वेदनाके कारण मूर्च्छित अथवा प्रतिबद्ध (कुण्ठित) हो गयी हैं, अपने देहसे ही एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाते समय विज्ञानशून्य (अचेत) देखे गये हैं, उसी प्रकार स्वर्गभोगके निमित्तभूत कर्मोंका क्षय हो जानेसे जिनके जलीय शरीर नष्ट हो गये