छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 687, कुल 978 में से
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खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| पिता--यथेदं लवणं दर्शनस्पर्शनाभ्यां पूर्वं गृहीतं पुनरुदके विलीनं ताभ्यामगृह्यमाणमपि विद्यत एवोपायान्तरेण जिह्वयोपलभ्यमानत्वात् । एवमेवात्रैवास्मिन्नेव तेजोऽबन्नादिकार्ये शुङ्गे देहे, वाव किलेत्याचार्योपदेशस्मरणप्रदर्शनार्थौ, सत्तेजोऽबन्नादिशुङ्गकारणं वटबीजाणिमवद्विद्यमानमेवेन्द्रियैर्नोपलभसे न निभालयसे यथात्रैवोदके दर्शनस्पर्शनाभ्यामनुपलभ्यमानं लवणं विद्यमानमेव जिह्वयोपलब्धवानसि, एवमेवात्रैव किल विद्यमानं सज्जगन्मूलमुपायान्तरेण लवणाणिमवदुपलप्स्यस इति वाक्यशेषः ॥ २ ॥ | पिताने कहा--'जिस प्रकार यह नमक पहले दर्शन और स्पर्शनसे गृहीत होता हुआ भी फिर जलमें विलीन होनेपर उनसे गृहीत न होनेपर भी उसमें विद्यमान है ही, क्योंकि उपायान्तरसे अर्थात् जिह्वाद्वारा उसकी उपलब्धि होती है; इसी प्रकार यहाँ—तेज, अप् और अन्नके कार्यभूत इस शरीररूप शुङ्गमें—यहाँ 'वाव' और 'किल' ये दो निपात आचार्योपदेशका स्मरण प्रदर्शित करनेके लिये हैं— तेज, जल और अन्नादि शुङ्गके कारणभूत सत्को तू वटबीजकी अणिमाके समान विद्यमान रहते हुए भी इन्द्रियोंसे उपलब्ध नहीं करता—तुझे वह दिखायी नहीं देता। जिस प्रकार कि यहाँ जलमें दर्शन और स्पर्शनसे उपलब्ध न होनेवाले विद्यमान नमकको तूने जिह्वासे उपलब्ध किया है उसी प्रकार निश्चय यहीं विद्यमान जगत्के मूलभूत सत्को तू लवणकी अणिमाके समान अन्य उपायसे उपलब्ध कर सकता है—यह वाक्यशेष है ॥ २ ॥ |