छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 686, कुल 978 में से
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| ३८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| एवाप्सु, उपलभ्यते चोपायान्तरेण—इत्येतत्पुत्रं प्रत्याययितुमिच्छन्नाहाङ्गास्योदकस्यान्तादुपरि गृहीत्वाचामेत्युक्त्वा पुत्रं तथा कृतवन्तमुवाच—कथमिति; इतर आह लवणं स्वादत इति । तथा मध्यादुदकस्य गृहीत्वाचामेति, कथमिति, लवणमिति । तथान्तादधोदेशाद्गृहीत्वाचामेति, कथमिति, लवणमिति । <br><br> यद्येवम्, अभिप्रास्य परित्यज्यैतदुदकमाचम्याथ मोपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । लवणं परित्यज्य पितृसमीपमाजगामेत्यर्थः, इदं वचनं ब्रुवन्—तल्लवणं तस्मिन्नेवोदकेयन्मया रात्रौ क्षिप्तं शश्वन्नित्यं संवर्तते विद्यमानमेव सत्सम्यग्वर्तते । <br><br> इत्येवमुक्तवन्तं तं होवाच | और एक दूसरे उपायसे उसकी उपलब्धि भी हो सकती है—इस बातकी पुत्रको प्रतीति करानेकी इच्छासे आरुणिने कहा—'हे वत्स ! इस जलके अन्त—ऊपरी भागसे लेकर आचमन कर।' ऐसा कहकर पुत्रके उसी प्रकार करनेपर वह बोला—'कैसा है ?' [ पुत्र— ] 'स्वादमें नमकीन है।' [ पिता-- 'और जलके मध्यभागसे भी लेकर आचमन कर' 'कैसा है ?' [पुत्र-] 'नमकीन है।' [पिता--] 'अच्छा, अन्त—नीचेके भागसे भी लेकर आचमन कर कैसा है ?' [ पुत्र-- ] 'नमकीन है।' <br><br> [ पिता--] 'यदि ऐसा है तो इस जलको फेंककर आचमन करनेके अनन्तर मेरे पास आ।' उसने वैसा ही किया, अर्थात् उस नमकीन जलको फेंककर वह इस प्रकार कहता हुआ पिताके पास आया कि रात मैंने जो नमक उस जलमें डाला था वह उसमें शश्वत्—नित्य वर्तमान है अर्थात् उसमें विद्यमान हुआ ही सम्यक्प्रकारसे वर्तमान है। <br><br> इस प्रकार कहते हुए उस पुत्रसे |