छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 685, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| खण्ड १३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ६८१ |
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| ल्लवणमाजिहीर्षुर्ह किलावमृश्यो-<br>दके न विवेद न विज्ञातवान्; यथा<br>तल्लवणं विद्यमानमेव सदप्सु<br>लीनं संश्लिष्टमभूत् ॥ १ ॥ | उसने उस नमकको ले आनेकी इच्छा-<br>से जलमें टटोला, किंतु उसे न पाया,<br>क्योंकि वह नमक वहाँ मौजूद होने-<br>पर भी जलमें लीन हो गया था<br>अर्थात् जलमें ही मिल गया था ॥ १ ॥ |
<div align="center">—:००:—</div>यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रायैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तꣳहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥
[ आरुणि—] ‘जिस प्रकार वह नमक इसीमें विलीन हो गया है [ इसलिये तू उसे नेत्रसे नहीं देख सकता, उसे यदि जानना चाहता है तो ] इस जलको ऊपरसे आचमन कर।’ [ उसके आचमन करनेपर आरुणिने पूछा— ] ‘कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘बीचमेंसे आचमन कर’ ‘अब कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘नीचेसे आचमन कर’ ‘अब कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘अच्छा, अब इस जलको फेंककर मेरे पास आ।’ उसने वैसा ही किया, [ और बोला— ] ‘उस जलमें नमक सदा ही विद्यमान था।’ तब उससे पिताने कहा—‘हे सोम्य ! [ इसी प्रकार ] वह सत् भी निश्चय यहीं विद्यमान है, तू उसे देखता नहीं है; परंतु वह निश्चय यहीं विद्यमान है’ ॥ २ ॥
| यथा विलीनं लवणं न वेत्थ तथापि तच्चक्षुषा स्पर्शनेन च पिण्डरूपं लवणमगृह्यमाणं विद्यत | जिस प्रकार वह नमक विलीन हो गया है इसलिये तू उसे नहीं जान सकता । तथापि वह पिण्डरूप लवण दिखायी न देनेपर भी है जलमें ही, |