छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 684, कुल 978 में से
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त्रयोदश खण्ड
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लवणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
| विद्यमानमपि वस्तु नोपलभ्यते प्रकारान्तरेण तूपलभ्यत इति शृण्वत्र दृष्टान्तम् । यदि चेममर्थं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि— | विद्यमान होनेपर भी [ कोई-कोई ] वस्तु उपलब्ध नहीं होती । हाँ, प्रकारान्तरसे उसकी उपलब्धि हो सकती है । इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर, यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता हो तो— |
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लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति सह तथा चकार तँहोवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥
इस नमकको जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास आना । आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतुने वैसा ही किया । तब आरुणिने उससे कहा—'वत्स ! रात तुमने जो नमक जलमें डाला था उसे ले आओ।' किंतु उसने ढूँढ़नेपर उसे उसमें न पाया ॥ १ ॥
| पिण्डरूपं लवणमेतद्घटादावुदकेऽवधाय प्रक्षिप्याथ मा मां श्वः प्रातरुपसीदथा उपगच्छेथा इति । स ह पित्रोक्तमर्थं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छंस्तथा चकार । तं होवाच परेद्युः प्रातर्यल्लवणं दोषा रात्रावुदकेऽवाधा निक्षिप्तवानस्यङ्ग हे वत्स तदाहरेत्युक्तस्त- | इस पिण्डरूप नमकको घड़े आदिमें जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास आना । श्वेतकेतुने पिताकी कही हुई बातको प्रत्यक्ष करनेकी इच्छासे वैसा ही किया । दूसरे दिन सबेरे ही आरुणिने उससे कहा—'हे वत्स ! रात तुमने जो नमक पानीमें डाला था उसे ले आओ।' इस प्रकार कहे जानेपर |
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