छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 689, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश खण्ड
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अन्यत्रसे लाये हुए पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ् वोदङ् वाधराङ् वा प्रत्यङ् वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार [ कोई चोर ] जिसकी आँखें बँधी हुई हों ऐसे किसी पुरुषको गान्धार देशसे लाकर जनशून्य स्थानमें छोड़ दे । उस जगह जिस प्रकार वह पूर्व, उत्तर, दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख करके चिल्लावे कि 'मुझे आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया है और आँखें बँधे हुए ही छोड़ दिया गया है' ॥ १ ॥
| यथा लोके हे सोम्य पुरुषं यं कश्चिद्गन्धारेभ्यो जनपदेभ्योऽभिनद्धाक्षं बद्धचक्षुषमानीय द्रव्यहर्ता तस्करस्तमभिनद्धाक्षमेव बद्धहस्तमरण्ये ततोऽप्यतिजनेऽतिगतजनेऽत्यन्तविगतजने देशे विसृजेत्स तत्र दिग्भ्रमोपेतो यथा प्राङ्वा प्राग्गमनः प्राङ्मुखो वेत्यर्थः । तथोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीत शब्दं कुर्या- | हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार कोई द्रव्य हरण करनेवाला चोर किसी पुरुषको जो अभिनद्धाक्ष हो अर्थात् जिसकी आँखें बाँध दी गयी हों, गान्धार देशसे लाकर वनमें और उसमें भी जो अतिजन—अतिगतजन अर्थात् अत्यन्त जन-शून्य हो ऐसे देशमें आँखें और हाथ बँधे हुए ही छोड़ दे तो उस जगह वह दिग्भ्रमसे युक्त हुआ 'प्राङ् वा'—पूर्वकी ओर जाता हुआ अर्थात् पूर्वाभिमुख हुआ तथा उत्तर, दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख |