छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 690, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| द्विक्रोशेत्, अभिनद्धाक्षोऽहं गन्धारेभ्यस्तस्करेणानीतोऽभिनद्धाक्ष एव विसृष्ट इति ॥ १ ॥ | करके इस प्रकार शब्द कहे अर्थात् चिल्लावे कि मुझे गान्धार देशसे आँखें बाँधकर यहाँ चोर ले आया है और आँखें बँधे हुए ही छोड़ दिया है' ॥ १ ॥ |
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| एवं विक्रोशतः— | इस प्रकार चिल्लानेवाले— |
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तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन्पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य इति ॥ २ ॥
उस पुरुषके बन्धनको खोलकर जैसे कोई कहे कि 'गान्धार देश इस दिशामें है, अतः इसी दिशाको जा,' तो वह बुद्धिमान् और समझदार पुरुष एक ग्रामसे दूसरा ग्राम पूछता हुआ गान्धारमें ही पहुँच जाता है, इसी प्रकार इस लोकमें आचार्यवान् पुरुष ही [सत्को] जानता है; उसके लिये [ मोक्ष होनेमें ] उतना ही विलम्ब है जबतक कि वह [ देहबन्धनसे ] मुक्त नहीं होता । उसके पश्चात् तो वह सत्सम्पन्न (ब्रह्मको प्राप्त ) हो जाता है ॥ २ ॥
| तस्य यथाभिनहनं यथा बन्धनं प्रमुच्य मुक्त्वा कारुणिकः कश्चिदेतां दिशमुत्तरतो गन्धारा | उस पुरुषके अभिनहन—बन्धनको खोलकर जिस प्रकार कोई कृपालु पुरुष कहे कि इस दिशामें उत्तरकी ओर गान्धार | | एतां दिशं व्रजेति प्रब्रूयात्स एवं कारुणिकेन बन्धनान्मोक्षितो | देश है; अतः इस दिशाकी ओर जा तो इस प्रकार उस कृपालु | | ग्रामाद्ग्रामान्तरं पृच्छन्पण्डित | पुरुषद्वारा बन्धनसे छुड़ाया हुआ |