भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 700, कुल 978 में से

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पृष्ठ 700
६९६छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ६
निमित्तफलाभिसंधानेन गमनदर्शनात् । न हि सदात्मैकत्वदर्शिनः सत्याभिसन्धस्य देशकालनिमित्तफलाद्यनृताभिसंधिरुपपद्यते, विरोधात्। अविद्याकामकर्मणां च गमननिमित्तानां सद्विज्ञानहुताशनविप्लुष्टत्वादगमनानुपपत्तिरेव, "पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः" इत्याद्याथर्वणे। नदीसमुद्रदृष्टान्तश्रुतेश्च ॥ २ ॥पूर्वक देखा जाता है और सदात्माका एकत्व देखनेवाले सत्यनिष्ठ विद्वान्‌को देश, काल, निमित्त और फल आदि असद्वस्तुओंका अभिनिवेश होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इसका उस (सत्यनिष्ठा) से विरोध है। गमनके निमित्तभूत अविद्या, कामना और कर्मोंके सद्विज्ञानरूप अग्निसे भस्म हो जानेके कारण उसके गमनकी अनुपपत्ति ही है। "पूर्णकाम कृतकृत्य पुरुषकी सम्पूर्ण कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं" ऐसा अथर्वण श्रुतिमें कहा है; और इसके सिवा नदी-समुद्र-दृष्टान्तकी श्रुति भी है * ॥ २ ॥
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स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला--] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥


* देखिये मुण्डक० ३।२।८

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