छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 750, कुल 978 में से
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| ७४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| बलं वाव विज्ञानाद्भूयः । | बल ही विज्ञानसे उत्कृष्ट है। |
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| बलमित्यन्नोपयोगजनितं मनसो विज्ञेये प्रतिभानसामर्थ्यम् । अनशनात् "ऋगादीनि न वै मा प्रतिभान्ति भोः" (छा० उ० ६।७।२) इति श्रुतेः। शरीरेऽपि तदेवोत्थानादि सामर्थ्यं यस्माद्विज्ञानवतां शतमप्येकः प्राणी बलवानाकम्पयते यथा हस्ती मत्तो मनुष्याणां शतं समुदितमपि । | अन्नके उपयोगसे प्राप्त हुई मनकी विज्ञेय पदार्थके प्रतिभानकी शक्तिका नाम 'बल' है; क्योंकि अनशन करनेके कारण "भगवन् ! मुझे ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता" ऐसी [छठे अध्यायमें श्वेतकेतुका वाक्यरूप] श्रुति है। शरीरमें भी वह बल ही उठने आदिका सामर्थ्य है, क्योंकि सौ विज्ञानवानोंको भी एक ही बलवान् प्राणी इस प्रकार कम्पायमान कर देता है जैसे एकत्रित हुए सौ मनुष्योंको एक मत्त हाथी । |
| यस्मादेवमन्नाद्युपयोगनिमित्तं बलं तस्मात्स पुरुषो यदा बली बलेन तद्वान्भवत्यथोत्थातोत्थानस्य कर्तोत्तिष्ठंश्च गुरूणामाचार्यस्य च परिचरिता परिचरणस्य शुश्रूषायाः कर्ता भवति परिचरन्नुपसत्ता तेषां समीपगोऽन्तरङ्गः प्रियो भवतीत्यर्थः । | क्योंकि अन्नादिके उपयोगके कारण होनेवाला बल ऐसा है इसलिये यह पुरुष जिस समय बली अर्थात् बलसे बलयुक्त होता है तो वह उत्थाता अर्थात् उत्थान करनेवाला होता है । उत्थान करनेवाला होकर वह गुरुजन और आचार्यका परिचारक-परिचर्या यानी शुश्रूषा करनेवाला होता है ! परिचर्या करनेपर उपसत्ति करनेवाला-उनके समीप पहुँचनेवाला-उनका अन्तरङ्ग अर्थात् प्रिय होता है । |