छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 751, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४७
| उपसीदंश्च सामीप्यं गच्छन्नेकाग्रतयाचार्यस्यान्यस्य चोपदेष्टुर्गुरोर्द्रष्टा भवति । ततस्तदुक्तस्य श्रोता भवति । तत इदमेभिरुक्तमेवमुपपद्यत इत्युपपत्तितो मन्ता भवति मन्वानश्च बोद्धा भवत्येवमेवेदमिति । तत एवं निश्चित्य तदुक्तार्थस्य कर्तानुष्ठाता भवति विज्ञातानुष्ठानफलस्यानुभविता भवतीत्यर्थः । किञ्च बलस्य माहात्म्यं बलेन वै पृथिवी तिष्ठतीत्याद्यृज्वर्थम् ॥ १ ॥ | उपसन्न होने अर्थात् समीप जानेपर वह एकाग्रभावसे आचार्य अथवा किसी अन्य उपदेश करनेवाले गुरुका दर्शन करनेवाला होता है । फिर वह उनके कथनको श्रवण करनेवाला होता है । तत्पश्चात् 'इनका यह कथन इस प्रकार उपपन्न है' इस प्रकार युक्तिपूर्वक मनन करनेवाला होता है । तथा मनन करनेपर 'यह बात ऐसी ही है' इस प्रकार उसे जाननेवाला होता है । फिर इस प्रकार निश्चय कर वह उनकी कही हुई बातका कर्ता—अनुष्ठान करनेवाला होता है, तथा विज्ञाता यानी अनुष्ठानके फलका अनुभव करनेवाला होता है—ऐसा इसका तात्पर्य है । इसके सिवा बलकी महिमा इस प्रकार है—बलसे पृथिवी स्थित है—इत्यादि शेष अर्थ सरल है ॥१॥ |
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स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद्भूय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥