भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 816, कुल 978 में से

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पृष्ठ 816

८१२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इत्यर्थः । इदं सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः ।सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी स्थित हैं [ तो जिस समय यह वृद्ध होता या नष्ट हो जाता है उस समय क्या क्या रहता है ? ]
कथमाचार्येणानुक्ताः कामा अन्तेवासिभिरुच्यन्ते ?**शङ्का—**आचार्यने जिनका निरूपण नहीं किया उन कामनाओंको शिष्यगण क्यों [ ब्रह्मपुरमें स्थित ] बतलाते हैं ?
नैष दोषः; यच्चास्येहास्ति यच्च नास्तीत्युक्ता एव ह्याचार्येण कामाः । अपि च सर्वशब्देन चोक्ता एव कामाः । यदा यस्मिन्काल एतच्छरीरं ब्रह्मपुराख्यं जरावलीपलितदिलक्षणा वयोहानिर्माप्नोति शस्त्रादिना वा वृक्णं प्रध्वंसते विस्रंसते विनश्यति किं ततोऽन्यदतिशिष्यते ।**समाधान—**यह दोष नहीं है; 'इस लोकमें जो कुछ इसका है और जो कुछ नहीं है' इस प्रकार आचार्यने कामनाओंके विषयमें कहा ही है। इसके सिवा 'सर्व' शब्दसे भी कामनाओंका कथन हो ही जाता है । जब—जिस समय इस ब्रह्मपुरसंज्ञक शरीरको झुर्रियाँ पड़ जाने और केशोंके पक जाने आदि रूपसे वृद्धावस्था अपनाती है अथवा उसकी आयुका क्षय प्राप्त होता है अथवा वह शस्त्रादिसे काटा जाकर ध्वंस—विस्रंसन यानी नाशको प्राप्त हो जाता है तो उससे भिन्न और क्या शेष रहता है ?
घटाश्रितक्षीरदधिस्नेहादिवद्-घटनाशे देहनाशेऽपि देहाश्रयमुत्तरोत्तरं पूर्वपूर्वनाशान्नश्यती-अभिप्राय यह है कि घटका नाश होनेपर घटस्थित दुग्ध, दही और घृतादिके नाशके समान देहका नाश होनेपर भी देहके आश्रित