भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 817

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३


त्यभिप्रायः। एवं प्राप्ते नाशे किं ततोऽन्यद्यथोक्तादतिशिष्यतेऽवतिष्ठते न किञ्चनावतिष्ठत इत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥उत्तरोत्तर कार्य पूर्व-पूर्व कारणका नाश होनेके कारण नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार नाश होनेपर उपर्युक्त नाशसे भिन्न और क्या रह जाता है? अर्थात् कुछ भी नहीं रहता—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥४॥

एवमन्तेवासिभिश्चोदितः—शिष्योंद्वारा इस प्रकार प्रश्न किये जानेपर—

स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥

उसे कहना चाहिए 'इस (देह) की जरावस्थासे यह (आकाशाख्य ब्रह्म) जीर्ण नहीं होता। इसके वधसे उसका नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है; इसमें [सम्पूर्ण] कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं; यह आत्मा है, धर्माधर्मसे शून्य है तथा जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, भोजनेच्छारहित, पिपासाशून्य, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है; जिस प्रकार इस लोकमें प्रजा राजाकी आज्ञाका अनुवर्तन करती है तो वह जिस-जिस सन्निहित वस्तुकी कामना करती है तथा जिस-जिस देश या भूभागकी इच्छा करती है उसी-उसीके आश्रित जीवन धारण करती है' ॥ ५ ॥