छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 818, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| स आचार्यो ब्रूयात्तन्मतिमपनयन् । कथम् ? अस्य देहस्य जरयैतद्यथोक्तमन्तराकाशाख्यं ब्रह्म यस्मिन् सर्वं समाहितं न जीर्यति देहवन्न विक्रियत इत्यर्थः। न चास्य वधेन शस्त्रादिघातेनैतद्धन्यते यथाकाशम्; किमु ततोऽपि सूक्ष्मतरमशब्दमस्पर्शं ब्रह्म देहेन्द्रियादिदोषैर्नस्पृश्यत इत्यर्थः । <br><br> कथं देहेन्द्रियादिदोषैर्न स्पृश्यत इत्येतस्मिन्नवसरे वक्तव्यं प्राप्तं तत्प्रकृतव्यासङ्गो मा भूदिति नोच्यते । इन्द्रविरोचनाख्यायिकायामुपरिष्टाद्वक्ष्यामो युक्तितः । <br><br> एतत्सत्यमवितथं ब्रह्मपुरं <br> ब्रह्मैव ब्रह्म-पुरम् । ब्रह्मैव पुरं ब्रह्मपुरं शरीराख्यं तु ब्रह्म- | उस आचार्यको उनकी [ शून्य-विषयिणी ] बुद्धिकी निवृत्ति करते हुए इस प्रकार कहना चाहिये । किस प्रकार कहना चाहिये ?— इस देहकी जरावस्थासे यह उपर्युक्त अन्तराकाशसंज्ञक ब्रह्म, जिसमें कि सब कुछ स्थित है जीर्ण नहीं होता, अर्थात् देहके समान उसका विकार नहीं होता, और न इसके वध अर्थात् शस्त्रादिके प्रहारसे यह नष्ट ही होता है, जैसे कि [ शस्त्रादिके आघातसे ] आकाशका नाश नहीं होता; फिर उससे भी सूक्ष्मतर अशब्द एवं अस्पर्श ब्रह्मको देह एवं इन्द्रियादिके दोषसे स्पर्श नहीं होता—इस विषयमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका तात्पर्य है । <br><br> देह एवं इन्द्रियादिके दोषोंसे ब्रह्मका स्पर्श क्यों नहीं होता ? इस बातका उल्लेख करना इस अवसरपर आवश्यक है; परंतु प्रसङ्गका विच्छेद न हो, इसलिये यहाँ नहीं कहा जाता । आगे इन्द्र-विरोचनकी आख्यायिकामें इसका युक्तिपूर्वक वर्णन करेंगे । <br><br> यह ब्रह्मपुर सत्य—अवितथ है । ब्रह्म ही पुर [अर्थात् ब्रह्मरूप पुरका नाम ] ब्रह्मपुर है । किंतु यह |