छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 825, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 825
द्वितीय खण्ड
—: o :—
दहर-ब्रह्मकी उपासनाका फल
| कथं सर्वेषु लोकेषु कामाचारो भवतीत्युच्यते। य आत्मानं यथोक्तलक्षणं हृदि साक्षात्कृतवान्वक्ष्यमाणब्रह्मचर्यादिसाधनसम्पन्नः संस्तत्स्थांश्च सत्यान् कामान् — | उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें किस प्रकार यथेच्छगति हो जाती है, यह बतलाते हैं—जिसने आगे बतलाये जानेवाले ब्रह्मचर्यादि साधनोंसे सम्पन्न हो अपने हृदयमें [अर्थात् ध्यानके द्वारा] उपर्युक्त लक्षणोंवाले आत्माका साक्षात्कार किया है तथा उसमें रहनेवाले सत्य कामोंको प्राप्त किया है— |
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स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवाश्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ १ ॥
वह यदि पितृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही पितृगण वहाँ उपस्थित होते हैं [अर्थात् उसके आत्मसम्बन्धी हो जाते हैं,] उस पितृलोकसे सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है ॥१॥
| स त्यक्तदेहो यदि पितृलोककामः पितरो जनयितारस्त एव सुखहेतुत्वेन भोग्यत्वाल्लोका उच्यन्ते तेषु कामो यस्य तैः पितृभिः सम्बन्धेच्छा यस्य भवति तस्य संकल्पमात्रादेव | वह यदि देह छोड़नेपर पितृलोककी कामनावाला होता है— पितर उत्पत्तिकर्त्ताओंको कहते हैं, सुखके हेतुरूपसे भोग्य होनेके कारण वे ही लोक कहे जाते हैं, उनके प्रति जिसकी कामना होती है अर्थात् उन पितृगणके साथ सम्बन्ध करनेकी जिनकी इच्छा |
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