भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 826, कुल 978 में से

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पृष्ठ 826
८२२छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ८

| पितरः समुत्तिष्ठन्त्यात्मसम्बन्धि- <br> तामापद्यन्ते । विशुद्धसत्त्वतया <br> सत्यसंकल्पत्वादीश्वरस्येव तेन <br> पितृलोकेन भोगेन सम्पन्नः सम्प- <br> त्तिरिष्टप्राप्तिस्तया समृद्धो मही- <br> यते पूज्यते वर्धते वा महिमान- <br> मनुभवति ॥ १ ॥ | होती है उसके संकल्पमात्रसे ही <br> पितृगण समुत्थित हो जाते हैं <br> अर्थात् आत्म-सम्बन्धित्वको प्राप्त <br> हो जाते हैं। शुद्धचित्त होनेसे ईश्वरके <br> समान सत्यसंकल्प होनेके कारण <br> वह उस पितृलोकके भोगसे सम्पन्न <br> हो—सम्पत्ति इष्टप्राप्तिका नाम है— <br> उससे समृद्ध हो वह महनीय पूजित <br> होता अथवा वृद्धिको प्राप्त होता है <br> यानी महिमाका अनुभव करता <br> है ॥ १ ॥ |

—: ० :—

अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ २ ॥

और यदि वह मातृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही माताएँ वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस मातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ २ ॥

अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ३ ॥

और यदि वह भ्रातृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही भ्रातृगण वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस भ्रातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

अथ यदि स्वसृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ४ ॥