छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 846, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 846
पञ्चम खण्ड
- : ० : -
यज्ञादिमें ब्रह्मचर्यदृष्टि
| य आत्मा सेतुत्वादिगुणैः स्तुतस्तत्प्राप्तये ज्ञानसहकारिसाधनान्तरं ब्रह्मचर्याख्यं विधातव्यमित्याह । यज्ञादिभिश्च तत्स्तौति कर्तव्यार्थम्— | जिस आत्माकी सेतुत्वादि गुणोंसे स्तुति की गयी है उसकी प्राप्तिके लिये ज्ञानसे इतर ज्ञानके सहकारी साधन ब्रह्मचर्यका विधान करना आवश्यक है; इसीसे श्रुति कहती है; तथा उसकी कर्तव्यताके लिये यज्ञादिरूपसे उसकी स्तुति करती है— |
|---|
अथ यद्यज्ञं इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥
अब, [ लोकमें ] जिसे 'यज्ञ' ( परमपुरुषार्थका साधन ) कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है वह ब्रह्मचर्यके द्वारा ही उस ( ब्रह्मलोक ) को प्राप्त होता है । और जिसे 'इष्ट' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा पूजन करके ही पुरुष आत्माको प्राप्त होता है ॥ १ ॥
| अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते लोके परमपुरुषार्थसाधनं कथयन्ति शिष्टास्तद्ब्रह्मचर्यमेव । यज्ञस्यापि | अब, जिसे 'यज्ञ' ऐसा कहा जाता है अर्थात् लोकमें जिसे शिष्ट पुरुष परम पुरुषार्थका साधन बतलाते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है । |
|---|