छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 894, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 894
| ४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नाहमत्रास्मिंश्छायात्मदर्शने देहात्मदर्शने वा भोग्यं फलं पश्यामीति। एवं दोषं देहच्छायात्मदर्शनेऽध्यवस्य स समित्पाणिर्ब्रह्मचर्यं वस्तुं पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच—मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः प्रगतवानसि विरोचनेन सार्धं किमिच्छन् पुनरागम इति। विजानन्नपि पुनः पप्रच्छेन्द्रामिप्रायाभिव्यक्तये। यद्वेत्थ तेन मोपसीदेति यद्वत्तथा च स्वाभिप्रायं प्रकटमकरोद्यथैव खल्वयमित्यादि, एवमेवेति चान्वमोदत प्रजापतिः। | इस छायात्मदर्शन या देहात्मदर्शनमें मैं कोई भोग्य फल नहीं देखता। इस प्रकार देहात्मदर्शन या छायात्मदर्शनमें दोष निश्चयकर वे समित्पाणि हो पुनः ब्रह्मचर्यवास करनेके लिये लौट आये। उनसे प्रजापतिने कहा—'हे इन्द्र ! तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्तसे चले गये थे, अब क्या इच्छा करते हुए तुम पुनः आये हो?' उन्होंने अच्छी तरह जानते हुए भी इन्द्रके अभिप्रायकी अभिव्यक्तिके लिये [इस प्रकार] पुनः प्रश्न किया। [सप्तमाध्यायमें सनत्कुमारजीके] 'तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे प्रति उपसन्न होओ' ऐसा पूछनेपर जिस प्रकार नारदजीने अपना अभिप्राय प्रकट किया था उसी प्रकार इन्द्रने 'यथैव खल्वयम्' इत्यादि वाक्यसे अपना अभिप्राय प्रकट किया और प्रजापतिने 'एवमेव' ऐसा कहकर उसका अनुमोदन किया। |
| ननु तुल्येऽक्षिपुरुषश्रवणे देहच्छायामिन्द्रोऽग्रहीदात्मेति देहमेव तु विरोचनस्तत्किन्निमित्तम्। | शङ्का—किंतु अक्षिपुरुषका समानरूपसे श्रवण करनेपर भी इन्द्रने देहकी छायाको आत्मरूपसे ग्रहण किया और विरोचनने स्वयं देहको ही—सो ऐसा किस कारणसे हुआ ? |