छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 895, कुल 978 में से
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खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थं ८९१
| तत्र मन्यन्ते—यथेन्द्रस्यो-<br>दशरावादिप्रजापतिवचनं स्मरतो<br>देवानप्राप्तस्यैवाचार्योक्तबुद्ध्या<br>छायात्मग्रहणं तत्र दोषदर्शनं<br>चाभूत् । न तथा विरोचनस्य,<br>किं तर्हि ? देह एवात्मदर्शनं नापि<br>तत्र दोषदर्शनं बभूव तद्वदेव ।<br>विद्याग्रहणसामर्थ्यप्रतिबन्धदो-<br>षाल्पत्वबहुत्वापेक्षमिन्द्रविरोच-<br>नयोश्छायात्मदेहयोर्ग्रहणम् ।<br>इन्द्रोऽल्पदोषत्वादृदृश्यत इति<br>श्रुत्यर्थमेव श्रद्धानतया जग्राहे-<br>तरश्छायानिमित्तं देहं हित्वा<br>श्रुत्यर्थं लक्षणया जग्राह प्रजाप-<br>तिनोक्तोऽयमिति दोषभूय-<br>स्त्वात् । यथा किल नीलानील- | समाधान—इस विषयमें शिष्टजन<br>ऐसा मानते हैं—जिस प्रकार<br>इन्द्रको प्रजापतिका जलपात्रादि-<br>सम्बन्धी वाक्य स्मरण करते-करते<br>देवताके पास पहुँचे बिना ही<br>आचार्यकी बतलायी हुई दृष्टिसे<br>छायात्माका ग्रहण और उसमें दोष-<br>दर्शन भी हुआ; तथा विरोचनको<br>वैसा नहीं हुआ, तो क्या हुआ ?<br>—उसकी देहमें ही आत्मदृष्टि हुई<br>और उसमें कोई दोषदर्शन भी नहीं<br>हुआ—उसी प्रकार विद्याग्रहण-<br>की सामर्थ्यका प्रतिबन्ध करनेवाले<br>दोषकी न्यूनाधिकताकी अपेक्षासे<br>इन्द्र और विरोचनका छायात्म<br>और देहात्मसम्बन्धी ग्रहण है ।<br>इन्द्रने अल्पदोषयुक्त होनेके कारण<br>श्रद्धा करते हुए 'दृश्यते' इस श्रुति-<br>के अर्थको ही ग्रहण किया और<br>दूसरे ( विरोचन ) ने दोषकी<br>अधिकताके कारण श्रुत्यर्थको छोड़-<br>कर लक्षणासे 'प्रजापतिने देहके<br>विषयमें ही कहा है' इस प्रकार देह-<br>को ही ग्रहण किया । जिस प्रकार<br>दर्पणमें दीखनेवाले नील और<br>अनीलवर्ण वस्त्रोंमें जो नील है वह |