भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 911

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
संत्रासो भवति यथा ग्रस्तमेव सदा व्याप्तमेव मृत्युनेत्युक्त इति वैराग्यार्थं विशेष इत्युच्यत आत्तं मृत्युनेति । कथं नाम देहाभिमानतो विरक्तः सन्निवर्तत इति । शरीरमप्यत्र सहेन्द्रियमनोभिरुच्यते ।होता जितना कि ‘मृत्युसे ग्रस्त अर्थात् सर्वदा व्याप्त ही है’ ऐसा कहनेपर होता है। अतः वैराग्यके लिये विशेषरूपसे कहनेके लिये यह कहा गया है कि यह मृत्युसे व्याप्त है; जिससे कि किसी-न-किसी तरह यह देहाभिमानसे विरक्त होकर निवृत्तिपरायण हो जाय। यहाँ शरीर भी इन्द्रिय और मनके सहित कहा गया है।
तच्छरीरमस्य सम्प्रसादस्य त्रिस्थानतया गम्यमानस्यामृतस्य मरणादिदेहेन्द्रियमनोधर्मवर्जितस्येत्येतत् । अमृतस्येत्यनेनैवाशरीरत्वे सिद्धे पुनरशरीरस्येति वचनं वाय्वादिवत्सावयवत्वमूर्त्तिमत्त्वे मा भूतामिति । आत्मनो भोगाधिष्ठानम् । आत्मनो वा सत ईक्षितुस्तेजोऽबन्नादिक्रमेणात्पनमधिष्ठानम् । जीवरूपेण प्रविश्यवह शरीर जाग्रदादि तीन स्थानोंके सम्बन्धसे विदित होनेवाले इस अमृत—देह, इन्द्रिय और मनके मरणादि-धर्मोंसे रहित सम्प्रसादका [ अधिष्ठान है ]। आत्माका अशरीरत्व तो ‘अमृतस्य’ इस पदसे ही सिद्ध होता है; किंतु फिर भी ‘अशरीरस्य’ ऐसा जो कहा गया है वह इसलिये है कि वायु आदिके समान आत्माके सावयवत्व और अमूर्त्तिमत्त्वका प्रसंग न हो जाय। उस आत्माका यह भोगाधिष्ठान है। अथवा आत्मासे—ईक्षण करनेवाले सत्-से तेज, अप् और अन्नादि क्रमसे उत्पन्न हुआ ‘अधिष्ठान’ (उस अपने उत्पादककी उपलब्धिका अधिकरण) है;