छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 912, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| सदेवाधितिष्ठत्यस्मिन्निति वाधिष्ठानम् । | या [ यों समझो कि ] इसमें जीव-रूपसे प्रवेश करके सत् ही अधिष्ठित है, इसलिये यह अधिष्ठान है । | | यस्येदमीदृशं नित्यमेव मृत्युग्रस्तं धर्माधर्मजनितत्वात्प्रियाप्रियवदधिष्ठानं तदधिष्ठितस्तद्वान् सशरीरो भवति । अशरीरस्वभावस्यात्मनस्तदेवाहं शरीरं शरीरमेव चाहमित्यविवेकात्मभावः सशरीरत्वमत एव सशरीरःसन्नात्तो ग्रस्तः प्रियाप्रियाभ्यां प्रसिद्धमेतत् । | जिसका यह इस प्रकारका अधिष्ठान सदा ही मृत्युग्रस्त और धर्माधर्मजनित होनेके कारण प्रियाप्रियवान् है उसमें अधिष्ठित हुआ उससे युक्त यह आत्मा 'सशरीर' है । अशरीरस्वभाव जो आत्मा है उसका 'वह मैं ही शरीर हूँ और शरीर ही मैं हूँ' ऐसा अविवेकात्मभाव ही सशरीरत्व है । इसीसे सशरीर रहते हुए यह प्रिय और अप्रियसे आत्त—ग्रस्त रहता है—यह बात प्रसिद्ध है । | | तस्य च न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोर्बाह्यविषयसंयोगवियोगनिमित्तयोर्बाह्यविषयसंयोगवियोगौ ममेति मन्यमानस्यापहतिर्विनाश उच्छेदः संततिरूपयोर्नास्तीति । तं पुनर्देहाभिमानादशरीरस्वरूपविज्ञानेन निवर्तिताविवेकज्ञानमशरीरं सन्तं प्रियाप्रिये न स्पृशतः । स्पृशिः | बाह्य विषयोंके संयोग और वियोग मेरे हैं—ऐसा माननेवाले उस सशरीर रूपके बाह्य विषयोंके संयोग-वियोगसे होनेवाले प्रवाहरूप प्रिय और अप्रियकी अपहति नहीं होती अर्थात् उनका विनाश यानी उच्छेद नहीं होता । देहाभिमानसे उठकर अशरीरस्वरूप विज्ञानके द्वारा जिसका विवेकज्ञान निवृत्त हो गया है ऐसे उस अशरीरभूत आत्माको प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं करते । 'स्पृश' इस धातुसे प्रिय और अप्रिय प्रत्येकका सम्बन्ध |