छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 913, कुल 978 में से
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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| प्रत्येकं सम्बध्यत इति प्रियं न स्पृशत्यप्रियं न स्पृशतोति वाक्यद्वयं भवति । न म्लेच्छाशुच्यधार्मिकैः सह सम्भाषेतेति यद्वत् । धर्माधर्मकार्ये हि ते, अशरीरता तु स्वरूपमिति तत्र धर्माधर्मयोरसम्भवात्तत्कार्याभावो दूरत एवेत्यतो न प्रियाप्रिये स्पृशतः । | है; इसलिये 'प्रिय स्पर्श नहीं करता, अप्रिय स्पर्श नहीं करता' ये दो वाक्य होते हैं, जिस प्रकार कि 'म्लेच्छ, अपवित्र और अधार्मिक पुरुषोंसे सम्भाषण न करे' इस वाक्यमें 'सम्भाषण' क्रियाका म्लेच्छादि प्रत्येक पदसे सम्बन्ध है। वे (प्रिय और अप्रिय) धर्माधर्मके ही कार्य हैं, किंतु अशरीरता तो आत्माका स्वरूप है। अतः उसमें धर्माधर्मका अभाव होनेके कारण उनके कार्य (प्रियाप्रिय) भी दूर ही रहेंगे; इसीसे उसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं करते। |
| (प्रियस्पर्शप्रतिषेधे दूषणम्)<br>ननु यदि प्रियमप्यशरीरं न स्पृशतीति यन्मघवतोक्तं सुषुप्तस्थो विनाशमेवापीतो भवतीति तदेवेहाप्यापन्नम् । | शङ्का— किंतु यदि अशरीर आत्माको प्रिय भी स्पर्श नहीं करता तो इन्द्रने जो कहा था कि 'सुषुप्तिमें स्थित हुआ पुरुष विनाशको ही प्राप्त हो जाता है' वही बात यहाँ भी प्राप्त हो जाती है। |
| (उक्तदोषपरिहारः)<br>नैष दोषः; धर्माधर्मकार्ययोः शरीरसम्बन्धिनोः प्रियाप्रिययोः प्रतिषेधस्य विवक्षितत्वात् । अशरीरं | समाधान— यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ धर्माधर्मके कार्यभूत शरीरसम्बन्धी प्रियाप्रियका प्रतिषेध निरूपण करना इष्ट है। अर्थात् अशरीरको प्रियाप्रिय स्पर्श |