चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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[बायाँ स्तम्भ] त्रयोदशोऽध्यायः (पृ० १५१-१७२) स्नेहाध्यायः—अग्निवेश का प्रश्न पुनर्वसु का प्रतिवचन। स्नेहों के दो प्रकार के उत्पत्तिस्थान—स्थावर और जंगम। सब तेलों में सर्वश्रेष्ठ तिल तैल और स्नेहों में घृत। स्नेहों के गुण स्नेहपान गुण—उससे हानियाँ। स्नेह की २४ प्रकार की प्रविचारणाएं। स्नेह की तीन मात्रा प्रधान, मध्यम, ह्रस्व। कौनसा स्नेह किसके लिये हितकारी। स्नेह के अयोग्य व्यक्ति। स्निग्ध, अस्नि- ग्ध, अति स्निग्ध के लक्षण। स्नेहन कालमें हिताहित। उपसंहार। चतुर्दशोऽध्यायः (पृ० १७२-१८४) स्वेदाध्यायः—स्वेदविधि। स्ने- हन, स्वेदन के गुण—उपयोगिता— उसके परिणाम। स्वेदन की अवधि— अतिस्वेदन के लक्षण और उपचार। स्वेदन देने योग्य व्यक्ति। स्वेद-योग्य व्यक्ति। स्वेदन द्रव्य। नाड़ीस्वेद। उपनाहविधि। संकरस्वेद। प्रस्तरस्वेद। नाड़ीस्वेद। परिषेकस्वेद। अवगाहस्वेद जेन्ताकस्वेद। अश्मघनस्वेदविधि। कर्षू- स्वेद। कुटीस्वेदविधि। भूस्वेदविधि। कुम्भीस्वेदविधि। कूपस्वेद। होलाक- स्वेद। अग्निरहित स्वेद। स्वेदके दो प्रकार, अग्निस्वेद, निरग्नि-इनके भेद। उपसंहार। पञ्चदशोऽध्यायः (पृ० १८४-१९५) उपकल्पनीयः—चिकित्सा के पूर्व उचित साधनों के संग्रह का प्रयोजन। आयुर्वेद के ज्ञान-अज्ञान की तुलना-
[दायाँ स्तम्भ] अग्निवेश-आत्रेय संवाद। संशोधन के उपयोगी नाना प्रकार के उपकरणों का संग्रह। स्नेहन, स्वेदन की विधि। वमन के अयोग, सम्यकयोग और अतियोग के विशेष लक्षण। उत्तर उपचार-उपसंहार। षोडशोऽध्यायः (पृ० १९५-२०८) चिकित्साप्राभृतीयः—सद् वैद्य और असद् वैद्य के प्रयोगों में भेद। सम्यग् विरेचन के लक्षण। विरेचने के अतियोग के लक्षण। संशोधन योग्य व्यक्ति। संशोधन का फल। अतियोग होने पर क्या करना चाहिये। धातुओं की समता और विषमता पर विचार। उपसंहार। सप्तदशोऽध्यायः (पृ० २०८-२२५) कियन्तःशिरसीयः—शिरोरोग, हृदयरोग, वात आदि दोषों के संसर्गों से उत्पन्न रोग, क्षय-और-पिड़का और दोषों की गति के सम्बन्ध में अग्निवेश का प्रश्न। गुरु आत्रेय पुनर्वसु का प्रति- वचन। शिर में उत्पन्न होने वाले पांच प्रकार के शिरोरोग। वातजन्य शिरो- रोग के लक्षण। पित्तजन्य, कफजन्य और त्रिदोषजन्य शिरोरोग के लक्षण। पांच प्रकार के हृदय रोग। वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, और त्रिदोषजन्य हृदयशूल के लक्षण। कृमिजन्य हृद- यरोग के लक्षण। वात आदि दोषों के संसर्ग से उत्पन्न विकारों के ६२ भेद। दोषों के उपद्रव। अठारह प्रकारके क्षय। ओज का स्वरूप। क्षय के कारण।