भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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( ३ )

ग्राह्य विषयों के समयोग, अयोग, हीन- योग मिथ्यायोग और अतियोग । उनके परिणाम । सद्वृत्त शिक्षा । भोजन विषयक सद्वृत्त । शौचसद्वृत्त । स्त्रियों के सहयोग में सद्वृत्त । गुरुजनों के प्रति सद्वृत्त । अध्ययन के सम्बन्ध में सद्- वृत्त । शिष्टाचार । इति स्वस्थचतुष्कः । नवमोऽध्यायः (पृ० ११६-१२३) खुड्डाकचतुष्पादः—चिकित्सा के शुद्ध चार चरण । चिकित्सा का लक्षण । वैद्य के गुण । द्रव्य के गुण । परिचारक के गुण-रोगी के गुण । चिकित्सा के मुख्य कारण-वैद्य । मूढ़ वैद्य-उसके दोष । उपसंहार । दशमोऽध्यायः (पृ० १२३-१३०) महाचतुष्पादः—चिकित्सा का प्रयोजन । चिकित्सा करने और न करने पर विचार-मैत्रेय-आत्रेय संवाद । चिकित्सा की प्रत्यक्ष सफलता । रोगों के साध्यासाध्य पर विचार । सुख- साध्य-कृच्छ्रसाध्य । साध्य व्याधियों के तीन भेद । असाध्य और याप्य रोग । सुखसाध्य व्याधि के लक्षण । याप्य व्याधि के लक्षण । असाध्य व्याधि के लक्षण । वैद्य का कर्त्तव्य । उपसंहार । एकादशोऽध्यायः (पृ० १३०-१४८) त्रिस्रैषणीयः—तीन एषणाओंका वर्णन । प्राणैषणा, धनैषणा, परलोकै- षणा । नास्तिकता पर विचार-परलोक और आत्मा की सत्ता पर विचार । नास्तिक मतों का खण्डन । सत् असत् की चार प्रकार की परीक्षा । आप्तों के लक्षण । आप्तोपदेश-प्रत्यक्ष अनुमान- युक्ति। इन के द्वारा पुनर्जन्म का निर्णय । आप्तागम-वेद का निर्णय । प्रत्यक्ष अनु- मान युक्ति इन के द्वारा निर्णय । तीन प्रकार के उपस्तम्भ । तीन प्रकार का बल. रोग के तीन आयतन-पांचों ज्ञानेन्द्रिय और मन के अतियोग, अयोग, मिथ्या- योग । सात्म्य-असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग । मिथ्यायोग-प्रज्ञापराध । काल—काल के अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग । काल परिणाम । रोग के तीन प्रकार । मानस रोगों की औषध । तीन रोगमार्ग— शाखा मर्मस्थ और कोष्ठ । सात रोग- मार्ग । मध्यम रोगमार्ग । आभ्यन्तर रोगमार्ग । भिषक् वैद्य के तीन प्रकार । छद्मचर वैद्य का लक्षण । सिद्ध साधित वैद्य-सद्-वैद्य के लक्षण । औषध के तीन प्रकार-दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्य- पाश्रय और सत्त्वावजय । औषध के तीन प्रकार-अन्तःपरिमार्जन-बहिःपरिमार्जन, शस्त्रप्रणिधान । संग्रह । द्वादशोऽध्यायः (पृ० १४८-१५५) वातकलाकलीयः—वायु के अं- शांश-विकल्पना पर विचार । सांकृत्या- यन कुश का मत । कुमारशिरा भारद्वाज का मत । कांकायन का मत । धामागर्व बडिश का मत । वार्योविद का मत । मरीचि का मत । वार्योविदमरीचि-संवाद । मरीचि-काप्य संवाद । पुनर्वसु आत्रेय का मत । उपसंहार ।