भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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( २ ) चतुर्थोऽध्यायः ( पृ० ४५-६२ ) षड्विरेचनशताश्रितीयः-विरे- चन का शब्दार्थ संशमन चिकित्सा । विरेचन के छः सौ योग विरेचन ओष- धियों के ६ आश्रय कषाय की पांच योनियां । कषाय कल्पना की ५ विधि । कषायों के लक्षण । महाकषाय । ५०० कषायों की कल्पना । उत्तम वैद्य । पञ्चमोऽध्यायः ( पृ० ४५-८२ ) मात्राशितीयः-आहार की मात्रा आहार के चार प्रकार । मात्रा में खाने का फल । स्वस्थवृत्त । धूम्र प्रयोग की विधि । स्नैहिक धूम वैरेचनिक धूम । धूम्रपान के गुण । धूम्रपान के आठ काल । ठीक प्रकार से पान किये हुए धूम- पान का लक्षण। अधिक धूम्रपानमंड त्पन्न उपद्रव और उनकी चिकित्सा । धूम्रपान के अयोग्य जन । धूम पीने की विधि । धूम्रपान के आसन । नलिका की बना- वट । अयोग्य रूप में पिये धूम के लक्षण । अतियोग के रूप में धूमपान के लक्षण । नस्य प्रयोग । अणु तैल की विधि । दन्तधावन की विधि । दातुन करने से लाभ । जीभ को साफ़ करने की विधि । दातुन के लिये उत्तम वृक्ष स्नेहगण्डूष के गुण । शिर पर तैल लगाने से लाभ । कान मे तैल डालने से लाभ । शरीर पर तैल लगाने की विधि । पांव में तैल मर्दन के गुण । उबटन लगाना । स्नान का फल । स्वच्छ वस्त्र पहिनने के गुण । गन्ध माला आदि धारण करने के गुण । रत्न, आभू- षण आदि धारण करने से लाभ । दीर्घायु के लिये आवश्यक शुचिकर्म : जूता पहिनने के गुण । दण्ड धारण के गुण । संक्षेप से स्वस्थवृत्त । उपसंहार । षष्ठोऽध्यायः ( पृ० ८५-६४ ) तस्याशितीयः-- भोजन पर आश्रित आदान और विसर्ग काल का वर्णन । दो अयन । हेमन्तकाल की परिचर्या । हेमन्त ऋतु में त्याज्य । वसन्त की ऋतुचर्या । ग्रीष्मचर्या-वर्षाकाल की ऋतुचर्या । शरद्ऋतु की परिचर्या । हंसोदक का लक्षण । आंकःसात्म्य । उपसंहार ! सप्तमोऽध्यायः ( पृ० ६४-१०६ ) न वेगान्धारणीय.-मल मूत्र आदि के न रोकने का उपदेश । उनके रोकने से हानियां और चिकित्सा । मन के निन्दित कार्य । वाणी के निन्दित कर्म-शरीर के निन्दित कर्म । व्यायाम से लाभ। अधिक व्यायाम से हानियाँ । हितकारी कार्यों के सेवन का क्रम । प्रकृति । तदनुसार हित सेवन का उप- देश-कारण से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचने के उपाय । आगन्तुज रोगों के प्रतिकार । सेवन करने योग्य मनुष्य । उपसंहार । अष्टमोऽध्यायः ( पृ० १०७-११६ ) इन्द्रियोपक्रमणीयः-इन्द्रिय और उनके अर्थ और मन का वर्णन । पांच इन्द्रिय, उनके ग्राह्य पांच द्रव्य । उनके पांच ग्राह्य अर्थ । अध्यात्म गुण । द्रव्या- श्रित कर्म । इन्द्रिय और उनके साथ