चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ चरकसंहिता [अ० ८ सरण करता है, मन को उसी ही गुण वाला मुनि लोग कहते हैं। क्योंकि जिस गुण की अधिकता होगी उसी गुण वाला मन होगा ॥ ६ ॥ मनःपुरःसराणीन्द्रियाण्यथं-ग्रहण-समर्थानि भवन्ति ॥ ७॥ इन्द्रियां मन को साथ में लेकर ही विषय के ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। बिना मन के इन्द्रियां विषय को ग्रहण नहीं कर सकतीं ॥ ७ ॥ तत्र चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि ॥ ८ ॥ पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि—खं वायुर्ज्योतिरापो भूरिति ॥ ६ ॥ पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि अक्षिणी कर्णौ नासिके जिह्वा त्वक् चेति।१०। पञ्चेन्द्रियार्थाः—शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः ॥ ११ ॥ आंख, श्रोत्र, नासिका, जिह्वा और त्वचा ये पांच इन्द्रियां हैं। पांच इन्द्रियों के पांच ग्राह्य पदार्थ हैं, यथा आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी। इन्द्रियों के पांच अधिष्ठान हैं, यथा चक्षु गोलक दो, दोनों बाह्य कान, जीभ, दोनों नासिकायें और त्वचा। इन्द्रियों के पांच विषय हैं:—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। इन्द्रिय-ज्ञान भी पांच प्रकार का है—चक्षुर्ज्ञान, श्रोत्र-ज्ञान, गन्ध-ज्ञान, रस ज्ञान और स्पर्श ज्ञान ॥ ८-११ ॥ पञ्चेन्द्रियबुद्धयश्चक्षुर्बुद्ध्यादिकाः, ताः पुनरिन्द्रियेन्द्रियार्थसत्त्वा- त्मसंनिकर्षजाः क्षणिका निश्चयात्मिकाश्च इत्येतत्पञ्चपञ्चकम् ॥१२॥ ये पांचों इन्द्रियों के विषय, मन और आत्मा इनका एक साथ संयोग होने से उत्पन्न होते हैं। यह और ही क्षणिक निश्चयात्मक (स्थायो ज्ञान) है। इस प्रकार से ये पांच-पांच पदार्थों के समूह होते हैं ॥ १२ ॥ मनो मनोऽर्थो बुद्धिरात्मा चेत्यध्यात्म-द्रव्य-गुण-संग्रहः शुभाशुभ-प्रवृ- त्तिनिवृत्ति हेतुश्च, द्रव्याश्रितं च कर्म, यदुच्यते क्रियेति ॥ १३ ॥ मन, मन के अर्थ (विषय), बुद्धि और आत्मा यह अध्यात्म द्रव्यों का और गुणों का संग्रह है। तथा जो कर्म द्रव्य में आश्रित है उसे क्रिया कहते हैं। 'शुभ' दोनों लोकों में कल्याणकारी, अशुभ (लोकों में निन्दित), प्रवृत्ति, निवृत्ति ये कारण हैं ॥१३ ॥ तत्रानुमानगम्यानां पञ्च-महाभूत-विकार-समुदायात्मकानामपि स- तामिन्द्रियाणां तेजश्चक्षुषि, खं श्रोत्रे, घ्राणे क्षितिः, आपोरसने, स्पर्शनेऽ- निलो विशेषेणोपदिश्यते ॥ १४ ॥ अनुमान द्वारा जानने योग्य इन्द्रियां पंचमहाभूतों के विकार के समूह... उत्पन्न हुई हैं तो भी, तेज आंखों में, आकाश श्रोत्रों में, पृथिवी ना... और जल रसना में और वायु त्वचा में विशेष रूप से रहते हैं ॥ १४ ...