भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

अ० ८] सूत्रस्थानम् १०६ तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तत्तदात्मकमेवार्थमनुधावति, तत्स्वभावाद्द्विभुत्वाच्च ॥ १५ ॥ इनमें जो जो इन्द्रियाँ, जिस जिस भूत से बनी हैं वे विशेष रूप से उसी उसी (भूत) से बने अर्थ (विषय) को ग्रहण करती हैं। ये अपने समान स्वभाव वाली होने से समान जातिकारी विषय को ग्रहण करने में समर्थ होने से प्रधान भूतात्मक विषय को ही ग्रहण करती हैं। यथा आंख तैजस है, इसलिये वह तेज की ओर दौड़ती है, कान आकाश जन्य है इसलिये शब्द की ओर दौड़ते हैं। स्पर्श वायव्य होने से वायु की ओर, जिह्वा आप्य है इसलिये रस की ओर और घ्राण पार्थिव होने से पृथिवी की ओर दौड़ती है ॥ १५ ॥ यदर्थाति योगायोगमिथ्यायोगात्सममनस्कमिन्द्रियं विकृतिमापद्यमानं यथास्वं बुद्धयुपघाताय संपद्यते, समयोगान्तुनः प्रकृतिमापद्यमानं यथास्वं बुद्धिमाप्याययति ॥ १६ ॥ इनमें मन के साथ इन्द्रिय का विषय में अतियोग, अयोग, या मिथ्यायोग होने से 'विकृति' अर्थात् रोग उत्पन्न होकर अपने अपने ज्ञान के नाश के लिये उद्यत हो जाता है। समयोग से इन्द्रिय स्वभाव में रहकर अपने अपने ज्ञान की वृद्धि करती हैं। समान अर्थात् उचित योग से वृद्धि होती है ॥ १६ ॥ मनसस्तु चिन्त्यमर्थः, तत्र मनसो बुद्धेश्च त एव समानाति हीन- मिथ्यायोगाः प्रकृति-विकृति-हेतवो भवन्ति ॥ १७ ॥ मन का विषय चिन्तन करना है (सुख, दुःख, प्रयत्न आदि चिन्तनीय होने से मन के विषय हैं)। इसलिये मन और बुद्धि का समान योग स्वस्थता कारण है और मन एवं बुद्धि का अतियोग वा हीनयोग अथवा मिथ्यायोग विकृति अर्थात् 'विकार' या रोग का कारण है ॥ १७ ॥ तत्रेन्द्रियाणां समनस्कानामनुपतप्तानामनुपतापाय प्रकृतिभावे प्रय- तितव्यमेभिर्हेतुभिः। तद्यथा—सात्म्येन्द्रियार्थसंयोगेन, बुद्ध्या सम्यग- वेक्ष्यावेक्ष्य कर्मणां सम्यक्प्रतिपादनेन, देशकालात्मगुणांविपरीतोपसेव- नेन चेति । तस्मादात्महितं चिकीर्षता सर्वेण सर्वं सर्वदा स्मृतिमास्थाय सद्वृत्तमनुष्ठेयम् । तद्ध्यनुष्ठितं युगपत्संपादयत्यर्थद्वयमारोग्यमिन्द्रि- यविजयं चेति ॥ १८ ॥ इसलिये अपनी प्रकृति में स्थित मन सहित इन्द्रियों को स्वस्थ तथा अपने वश में रखने के लिये, विकृति से बचाने के लिये निम्न कारणों द्वारा प्रयत्न । उचित अनुकूल रूप से इन्द्रिय और विषय के संयोग न अति,