चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंन वैरं रोचयेत् , न कुर्यात्पापम् , न पापेऽपि पापी स्यात्, नान्यदोषान् ब्रूयात् , नान्यरहस्यमागमयेत् , नाधार्मिकैर्न नरेन्द्रद्विष्टैः सहाऽऽसीत, नोन्मत्तैर्न पतितैर्न भ्रूणहन्तृभिर्न क्षुद्रैर्न दुष्टैः, न दुष्टयानान्यारोहेत् , न जानुसमं कठिनमासनमध्यासीत, नानास्तीर्णमनुपहितमविशालमसमं वा शयनं प्रपद्येत, न गिरि-विषम-मस्तकेष्वनुचरेत् , न द्रुममारो- हेत् , न जलोप्रवेगमवगाहेत, कूलच्छायां नोपासीत, नाम्बुत्यानमभि- तश्चरेत् , नार्धंहसेत, न शब्दवन्तं मारुतं मुञ्चेत्, नासंवृतमुखो जृम्भां क्षवथुं हास्यं वा प्रवर्तयेत्, न नासिकां कुष्णीयात्, न दन्तान् विघट्टयेत्, न नखान् वादयेत्, नास्थीन्यभिहन्यात्, ने भूमिं विलिखेत्, न छिन्द्यात्तृणम्, न लोष्टं मृद्गीयात्, न विगुणमङ्गैश्चेष्टेत, ज्योतींष्यग्निममेध्यमशस्तञ्च नाभिर्वीक्षेत, न हुङ्कुर्याच्छवम्, न चैत्य- ध्वज-गुरु-पूज्याशस्त-च्छायामाक्रामेत्, न क्षपास्वनर-सदन-चैत्य-चत्वर- चतुष्पथो पवन-श्मशानाघातनान्यासेवेत, नैकः शून्यगृहं न चाटवीमनु- प्रविशेत्, न पापवृत्तान् स्त्री-मित्र-भृत्यान् भजेत, नोत्तमैर्विरुध्येत, नाव- रानुपासीत, न जिह्मं रोचयेत्, नानार्यमाश्रयेत्, न भयमुत्पादयेत् , न साहसातिस्वप्न-प्रजागर-स्नान-पानाशानान्यभ्यसेत्, नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेत्, न व्यालानुपसर्पेत्र दंष्ट्रिणो न विषाणिनः पुरोवात-तपावश्या- यातिप्रवातान् जह्यात्, कलिं नाऽऽरभेत, नाग्नुपहतोऽग्निमुपासीत, नोच्छिष्टो नाधःकृत्वा प्रतापयेत् , नाविगतक्लमो नाप्लुत्वेया न नग्न उपस्पृशेद्, न स्नानशाट्या स्पृष्टमुत्तमाङ्गम्, न केशाग्राण्यभिहन्यात्, नोपस्पृश्य त एव वाससी विधूयात्, नास्पृष्ट्वा रत्नाश्व-पूज्य-मङ्गल-सुम- सोऽभिनिष्क्रामेत्, न पूज्य-मङ्गलान्यपसव्यं गच्छेत्, नेतरान्यनुदक्षिणम्॥
झूठ न बोले, दूसरे के धन को न लेवे, दूसरे की स्त्री को न चाहे, दूसरे की सम्पत्ति की चाहना न करे, वैर न करे, पाप न करे, पाप में मन न लगाये अथवा पापी पुरुष पर भी पाप न करे, दूसरों के दोषों को न कहे, दूसरों की गुप्त बातों को न जाने अधार्मिक, एवं राजा से द्वेष करने वाले (राजशत्रुओं) के साथ न बैठे, पागल, पतित, नीच कर्म करने वाले, चाण्डाल आदि, भ्रूण- घाती (गर्भपात करने वाले ) क्षुद्र, (छोटे पुरुष ) दुष्ट (चोर डाकू आदि) के साथ न बैठे । दुष्टयान ( अनभ्यस्त घोड़े आदि ) पर न बैठे, घुटने ऊंचे कर ( उत्कट आसन से ) भी देर तक न बैठे, बिना नीचे बिछाये, तकिया और इाने रखे बिना, संकुचित स्थान पर, ऊंची नीची जगह पर न सोवे, मौन