चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] = सूत्रस्थानम् ११३ ऊंचे नीचे प्रदेशों में या चोटियों पर न घूमे फिरे, वृक्ष पर न चढ़े, पानी के तेज प्रवाह में स्नान न करे। नदी के किनारे खड़े वृक्ष की छाया में नहीं बैठे, अग्नि की लपट के चारों ओर न फिरे। ऊंचे से (जोर से) न हंसे। शब्द के साथ अधोवायु, (अपान वायु) न छोड़े, मुख को बिना ढांपे जम्भाई, छींक अथवा हास्य-हंसी न करे, नाक को न कुरेदे, दांतों को न किटकिटाये। नखों को न रगड़े, अस्थियों को न बजाये, भूमि को न कुरेदे, भूमि पर न लिखे, तिनके न तोड़े, मिट्टी के ढेले को न फोड़े, अंगों को व्यर्थ में टेढ़ा मेढ़ा न करे, न हिलाये। ज्योति (तैजस पदार्थ) सूर्य, अग्नि, तीव्राग्नि, अपवित्र चिता आदि निन्दित वस्तुओं को न देखे। शव को देखकर हुंकार न छोड़े, चैत्य (गांव के देवता) ध्वजा, पताका, गुरु माता पिता, आचार्य, पूज्य आदरणीय, प्रशस्त कल्याणकारी वस्तुओं की छाया को न लांघे, रात्रि में देवालय, मन्दिर, चैत्य (ग्राम्य देवता) गृह, आगन, चौराहा, बाग, श्मशान, (वध स्थान) में न रहे। अकेला एकान्त गृह में, शून्य घर में या जंगल में प्रवेश न करे। पाप- वृत्ति वाले स्त्री, मित्र अथवा नौकर का साथ न दे, अपने से श्रेष्ठों के साथ विरोध न करे, अपने से नीच हीन की सेवा न करे। कुटिल की चाहना न करे, अनार्य दुष्ट का आश्रय न ले, किसी के लिये भय उत्पन्न न करे, अतिसाहस अति सोना, बहुत जागना, बहुत स्नान, बहुत पीना, बहुत खाना नहीं करे। घुटने उठा कर देर तक न बैठे। सांप, दाढ़ वाले सिंह आदि, सींग वाले भैंस बैल आदि जन्तुओं के पास न जाये। सामने की वायु, धूप, ओस, तेज वायु को छोड़ दे। झगड़ा आरम्भ न करे। बिना सावधानी के अग्नि की उपासना पूजा न करे, जूठे भांजन को पुनः आग पर गरम न करे (जूठा भोजन आग में नहीं डालना चाहिये)। थकान मिटे बिना, मुख और सिर को जल से गीला किये बिना, वा नंगा होकर स्नान न करे। नहाने की धोती (कटि वस्त्र से) से शिर का स्पर्श न करे, बालों के अग्रभागों को ताड़न न करे; स्नान करके जिन कपड़ों से स्नान किया है, उन्हीं को निचोड़कर फिर धारण नहीं करे। रत्न, मणि आदि, पूज्य भगवान् आदि का नाम, मंगल कल्याणकारी वस्तुएं फूल आदि को बिना स्पर्श किये घर से बाहर न निकले। पूज्य एवं मंगलकारी वस्तुओं के वाम पार्श्व से न जाये, अपूज्य, अमंगल वस्तुओं के दक्षिण पार्श्व से न जाये॥ २१ ॥ रत्नपाणिर्नास्नातो नोपहृतवासा नाजपित्वा नाहुत्वा देवताभ्यो पितृभ्यो नादत्त्वा गुरुभ्यो नातिथिभ्यो नोपाश्रितेभ्यो नापुण्य-