चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ चरकसंहिता [अ० ८ गन्धो नामाली नाप्रक्षालितपाणिपादवदनो नाशुद्धमुखो नोदङ्मुखो न विमना नाभक्ताशिष्टाशुचि-क्षुधित-परिचरो नापात्रीष्वमेध्यासु नादेशे नाकाले नाकीर्णे नादत्त्वाऽग्रमग्नये नाप्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैर्न मन्त्रैरन- भिमन्त्रितं न कुत्सयन् न कुत्सितं न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत, न पर्युषितमन्यत्र मांस-हरित-शुष्क-शाक-फल-भक्ष्येभ्यः। नाशेषभुक्स्याद्- न्यत्र दधि-मधु-लवण-सक्तु-सर्पिग्भ्यः। न नक्तं दधि भुञ्जीत, न सक्तूने- कानश्रीयात्, न निशि न भुक्त्वा न बहून् न द्विनोदकान्तरितान् न छित्त्वा द्विजैर्भक्षयेत् ॥ २२ ॥ इन अवस्थाओं में भोजन न करे—रत्न को हाथ में लिये बिना, स्नान किये बिना, वस्त्र पहिने बिना, गायत्री जप किये बिना, हवन किये बिना, देव- ताओं के लिये दिये बिना, पिता माता को खिलाये बिना, आचार्य एवं बड़े पुरुषों को, अतिथियों को, आश्रितों को खिलाये बिना, अशुभ गन्धवाला, पुष्पमाला धारण किये बिना, हाथ पांव मुख धोये बिना, मलिन मुख से, उत्तर दिशा की ओर मुख करके, अन्य मन से, बिना भक्ति के दिया, ठीक प्रकार से या पवित्रता से न दिया, भूखे के हाथ से परसा, बिना पात्रों के मैले पात्रों में, अदेश में, (मैले या अनुचित स्थान पर) कुसमय में, संकुचित स्थान में, अग्नि को दिये बिना (वैश्वदेव यज्ञ किये बिना), प्रोक्षणोदक से विधिपूर्वक प्रोक्षित किये बिना, (वेदमन्त्रों से अभिमन्त्रित किये बिना) निन्दा करते हुए, निन्दित और प्रतिकूल अन्न को अपने मन के विरुद्ध मनुष्यों के पास में भोजन नहीं करना चाहिये। पर्युषित जिसे एक रात बीत गई है ऐसे बासी भोजन को नहीं खाना चाहिये। मांस, हरड़, सूखे हुए शाक, फल इनको बासी अर्थात् एक रात बीतने पर भी खा सकते हैं। सम्पूर्ण न खावे, पात्र में थोड़ा छोड़ देना चाहिये। परन्तु दही, शहद, लवण, सत्तू और घी इनको सम्पूर्ण खा लेना चाहिये, पवित्र होने से इन को झूठा न छोड़े। रात में दही नहीं खाये, अकेले सतुओं को न खाये अर्थात् केवल सत्तू न खाये। रात में सत्तू न खाये, भोजन खाकर सत्तू न खाये, बहुत अधिक मात्रा में सत्तू न खाये, एक दिन में दो बार सत्तू न खाये, पानी में भीगे हुए सत्तू या जौ का सत्तू बनाकर नहीं खाना चाहिये। दाँतों से काटकर न खाये ॥ २२ ॥ नानृजुः क्षुयान्नाद्यान्न शयीत। न वेगतोऽन्यकार्यः स्यात्। न चाप्य- ग्नि-सलिल-सोमार्क-द्विज-गुरु-प्रतिमुखं निष्ठीविका-वात-वर्चों- ऽसृजेत्, न पन्थानमवमूत्रयेत्, न जनवति नाग्निकाले। जप- बलि-मङ्गल-क्रियासु श्लेष्मसिङ्घाणकं मुञ्चेत् ॥ २३ ॥