चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८ चरकसंहिता [ अ० ८ स्पृशेत्, द्विः परिमृज्यौष्ठौ पादौ चाभ्युक्ष्य मूर्धनि खानि चोपस्पृशेदद्भि- रात्मानं हृदयं शिरश्च, ब्रह्मचर्य-ज्ञान-दान-मैत्री-कारुण्य-हर्षोपेक्षा-प्रशम- परश्च स्यादिति ॥ २६ ॥ अपवित्र अवस्था में उत्तम गौ का घी, अक्षत, तिल, कुशा और सरसों द्वारा अग्नि में वेदमन्त्रों से हवन न करे और प्रार्थना करे कि अग्नि मेरे शरीर से बाहर न जाये। वायु मेरे अन्दर प्राणों को धारण करे। विष्णु मेरे अन्दर बल का संचार करें। इन्द्र मुझ में बल बढ़ावे। कल्याणकारी जल मुझ में प्रविष्ट हों। ‘आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन०’ इस मन्त्र से जल का स्पर्श स्नान आचमन करना चाहिये। दोनों समय भोजन करने के उप्रान्त ओष्ठ और पांव को धोकर शुष्क कर लेना चाहिये शिर और आंख, कान, नाक इन्द्रियों को जल से स्पर्श करे। फिर अपने हृदय, शिर को जल से स्पर्श करे। ब्रह्मचर्य (काय और मन वाणि से मैथुन को छोड़ना ब्रह्मचर्याश्रम में, गृहस्था- श्रम में भी अपनी पत्नी में ऋतुकाल को छोड़कर) तथा अन्यों को ज्ञान-दान, ‘मैत्री’ सब प्राणियों में आत्मवत् प्रवृत्ति, सब प्राणियों में दयाभाव, हर्ष, प्रसन्नता सब प्राणियों में, उपेक्षा अर्थात् अप्रतिग्रह बुद्धि, प्रशम अर्थात् शान्त इन्द्रिय एवं चित्तवाला बने ॥ २६ ॥ तत्र श्लोकाः-- पञ्चपञ्चकमुद्दिष्टं मनो हेतुचतुष्टयम् । इन्द्रियोपक्रमेऽध्याये सद्वृत्तमखिलेन च ॥ ३० ॥ स्वस्थवृत्तं यथोद्दिष्टं यः सम्यगनुतिष्ठति । स समाः शतमव्याधिरायुषा न वियुज्यते ॥ ३१ ॥ नृलोकमापूरयते यशसा साधुसंमतः । धर्मार्थावेति भूतानां बन्धुतामुपगच्छति ॥ ३२ ॥ परान् सुकृतिनो लोकान् पुण्यकर्मा प्रपद्यते । तस्माद् वृत्तममुष्ठेयमिदं सर्वेण सर्वदा ॥ ३३ ॥ यच्चान्यदपि किंचित्स्यादनुक्तमिह पूजितम् । वृत्तं तदपि चाऽऽत्रेयः सदैवाभ्यनुमन्यते ॥ ३४ ॥ पंचेन्द्रिय और इनके पांच प्रकार, मन एवं चार कारण (समयोग, मिथ्या- योग, हीनयोग, और अतियोग) और सम्पूर्ण सद्वृत्त को 'इन्द्रियोप...' अध्याय में कह दिया है। जो मनुष्य कहे हुए स्वस्थवृत्त का सम्यक् रूप से पालन करता है वह सौ वर्षों तक नीरोग रहता और...