भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

अ० ९ ] सूत्रस्थानम् ११६ आयु का भंग नहीं होता, वह सौ वर्षतक जीता है। साधुओं से पूजित होकर मनुष्यलोक को अपने यश से भर देता है, यशस्वी बनता है। धर्म और अर्थ को प्राप्त करता है। सब प्राणियों के प्रति बन्धुभाव उत्पन्न कर लेता है। पुण्य कर्मों वाला मनुष्य अति उत्कृष्ट लोकों को प्राप्त करता है। इसलिये सब पुरुषों को चाहिये कि सदा इस 'सद्वृत्त' का पालन करे। इस 'सद्वृत्त' के अतिरिक्त और जो कुछ उत्तम कर्म हों जो कि यहां पर नहीं भी कहे हैं, उनको भी स्वीकार करके पालन करना चाहिये ऐसा भगवान् आत्रेय का अभिप्राय है ॥ ३०-३४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के इन्द्रियोपक्रमणीयो नामाऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इति स्वस्थचतुष्कः ॥ नवमोऽध्यायः । अथातः खुड्डाकचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'खुड्डाक चतुष्पाद' (चिकित्सा के क्षुद्र चार चरण) नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ भिषग् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् । गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥ ३ ॥ वैद्य, औषध, परिचारक और रोगी ये चार पाद अर्थात् चिकित्सा के चार अंग हैं। ये चारों ही विकार अर्थात् रोगों की शान्ति में गुणवान् कारण हैं ॥३॥ विकारो धातुवैषम्यं, साम्यं प्रकृतिरुच्यते । सुखसंज्ञकमरोग्यं, विकारो दुःखमेव च ॥ ४ ॥ शरीर के धातु वात, पित्त और कफ की विषमता का नाम ही 'विकार' अर्थात् रोग है और धातुओं का 'साम्य' अर्थात् अनुकूलता रहने का नाम 'प्रकृति' है। आरोग्यता ही सुख है, रोग का होना दुःख है। वैद्यक शास्त्र में सुख-आरोग्यता है, और दुःख रोग है ॥४॥ चिकित्सा का लक्षण- चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते । प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते ॥ ५ ॥ धातुओं के विषम होने पर भिषक्, रोगी, औषध और परिचारक ये चारों गुणवाले मिलकर धातुओं को साम्य अर्थात् अनुकूल करने के लिये प्रवृत्त होते हैं, उसी को चिकित्सा कहते हैं ॥ ५ ॥