भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

१२० चरकसंहिता [ अ० ९ वैद्य के गुण— श्रुते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता । दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥ ६ ॥ सद्-गुरु के उपदेश मे पूर्ण रूप से शास्त्र का ठीक २ ज्ञान, चिकित्सा-कर्म का बहुत बार दर्शन, चिकित्सा कार्य में कुशलता, चिकित्सा कर्म की सिद्ध- हस्तता, पवित्रता, स्वच्छता ये वैद्य के गुण हैं ॥ ६ ॥ द्रव्य के गुण— बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविधकल्पना । संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते ॥ ७ ॥ (बहुता) द्रव्य की प्रचुरता (योग्यता) रोगियों के दिये जाने वाले द्रव्य में रोग को दूर करने का सामर्थ्य और जिसके अनेक प्रकार के कल्प, (स्वरस कल्क, चूर्ण, कषाय आदि) बनाये जा सकें, 'संपत्' अर्थात् रस, वीर्य, प्रभाव, गुण सम्पूर्ण हों, ठीक २ ऋतु में एकत्र की गई हो, ये चार गुण औषध में होने चाहिये ॥ ७ ॥ परिचारक के गुण— उपचारज्ञता दाक्ष्यमनुरागश्च भर्तरि । शौचं चेति चतुष्कोऽयं गुणः परिचरे जने ॥ ८ ॥ सेवा कर्म को जानने वाला, कर्मकुशल, रोगी में प्रीति रखने वाला शौच, अर्थात् शुद्धि, स्वच्छता ये चार गुण परिचारक के हैं ॥ ८ ॥ रोगी के गुण— स्मृति-निर्देश-कारित्वमभीरुत्वमथापि च । ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणाः स्मृताः ॥ ९ ॥ (स्मृति) स्मरण शक्ति, वैद्य के आदेश के अनुसार करने वाला, डरपोक न हो, रोग या चिकित्सा कर्म से न घबराने वाला, अपनी शिकायतों को भली प्रकार बता सके, ये चार गुण रोगी के हैं ॥ ६ ॥ कारणं षोडशगुणं सिद्धौ पादचतुष्टयम् । विज्ञाता शासिता योक्ता प्रधानं भिषगत्र तु ॥ १० ॥ पक्तौ हि कारणं पक्तुर्यथा पात्रेन्धनानलाः । विजेतुर्विजये भूमिश्चमूः प्रहरणानि च ॥ ११ ॥ आतुराद्यास्तथा सिद्धौ पादाः कारणसंज्ञिताः । वैद्यस्यातश्चिकित्सायां प्रधानं कारणं भिषक् ॥ १२ ॥