चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] सूत्रस्थानम् १२१ सोलह गुण युक्त चारों पाद मिलकर ही चिकित्सा में कारण हैं। इन सब में प्रधान कारण 'भिषक्' अर्थात् वैद्य ही है। क्योंकि वही विशेष रूप से जानने वाला, परिचारक आदि को आदेश देने वाला, दवाइयों का प्रयोग करने वाला होता है। तीनों पाद वैद्य के अधीन हैं और वैद्य स्वतन्त्र है, इसलिये प्रधान है। खाना पकाने में जिस प्रकार पाचक कारण है, और पात्र, ईंधन और आग ये उसके अधीन रहते हैं और जिस प्रकार विजेता की विजय में भूमि, स्थान, सेना, प्रहरण, शस्त्र आदि कारण निमित्त बनते हैं, उसी प्रकार सिद्धि अर्थात् चिकित्सा की सफलता में रोगी, औषध और परिचारक ये तीन कारण निमित्त होते हैं। चिकित्सा में मुख्य कारण वैद्य ही होता है ॥ १०-१२ ॥ मृद्दण्डचक्रसूत्राद्याः कुम्भकारादृते यथा । न वहन्ति गुणं वैद्यादृते पादत्रयं तथा ॥ १३ ॥ गन्धर्वपुरवन्नाशं यद्विकाराः सुदारुणाः । यान्ति यच्चेतरे वृद्धिमाशुपायप्रतोक्षिणः ॥ १४ ॥ सति पादत्रये ज्ञाना ज्ञौ भिषजावत्र कारणम् । जिस प्रकार कुम्हार के बिना मिट्टी, दण्ड, चक्र (चाक) सूत्र आदि मिल- कर भी घड़े को नहीं बना सकते उसी प्रकार वैद्य के बिना रोगी, द्रव्य और परिचारक मिलकर भी चिकित्सा-कार्य में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते। रोगी परिचारक और द्रव्य इन तीनों के होनेपर भी अतिशय भयानक जो रोग गन्धर्व पुर की भांति नष्ट हो जाते हैं और दूसरे साधारण रोग भी जो थोड़ी चिकित्सा से भी अच्छे हो सकते हैं-वे जो बढ़ते हैं-इन दोनों में ज्ञानवान् और अज्ञानी वैद्य ही कारण होता है। गन्धर्व पुर जादूगर का बनाया मकान अथवा आकाश का महल ॥ १३-१४ ॥ वरमात्मा हुतोऽज्ञेन न चिकित्सा प्रवर्तिता ॥ १५ ॥ पाणिचाराद्यथाऽचक्षुरज्ञानाद्भीतभीतवत् । नौर्मारुतवशेवाज्ञो भिषक्चरति कर्मसु ॥ १६ ॥ यदृच्छया समापन्नमुत्तार्य नियतायुषम् । भिषङ्कानी निहन्त्याशु शतान्यनियतायुषाम् ॥ १७ ॥ तस्माच्छास्त्रेऽर्थविज्ञाने प्रवृत्तौ कर्मदर्शने । भिषक् चतुष्टये युक्तः प्राणाभिसर उच्यते ॥ १८ ॥ म्थे मूढ़ वैद्य इलाज करे, इससे अच्छा अपनी हत्या कर लेना है। अन्धा कैंकरके डरता हुआ जिस प्रकार हाथ से टटोल कर चलता है, वायु