चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ चरकसंहिता [ अ० ९ के वश में पड़ी हुई नाव जिस प्रकार कहीं की कहीं वह जाती है, उसी प्रकार मूढ़ वैद्य भी चिकित्सा-कर्म में प्रवृत्त होता है। नियत आयु वाले रोगियों के स्वतः अच्छा हो जाने से अपने को वैद्य मानने वाला मनुष्य जिनको आयु अभी शेष है, ऐसे सैकड़ों रोगियों को अपनी चिकित्सा से बिना समय के ही शीघ्र मार देता है। इसलिये शास्त्र में तत्त्वार्थ के ज्ञान में, क्रिया में, कर्म और कुशलता में इन चार गुणों से युक्त वैद्य ही 'प्राणाभिसर' अर्थात् रोगी के जाते प्राणों को भी लौटा लाने वाला कहलाता है ॥ १५-१८ ॥ हेतौ लिङ्गे प्रशमने रोगाणामपुनर्भवे । ज्ञानं चतुर्विधं यस्य स राजार्हो भिषक्तमः ॥ १९ ॥ जिस वैद्य को रोगोत्पत्ति के कारण, लक्षण, प्रशमन, रोगों की शान्ति और पुनः आक्रमण न होना इन चार बातों का ज्ञान है, वही 'राजवैद्य' होने योग्य है ॥ शस्त्रं शास्त्राणि सलिलं गुणदोषप्रवृत्तये । पात्रापेक्षीण्यतः प्रज्ञां चिकित्सार्थं विशोधयेत् ॥ २० ॥ शस्त्र, शास्त्र और पानी ये तीनों गुण और दोष को उत्पन्न करने में पात्र की अपेक्षा करते हैं। जैसे निर्मल पानी मैले पात्र में रखने से मैला हो जाता है और स्वच्छ पात्र में साफ दीखता है, तलवार से जहाँ दुष्ट चोर आदि का वध हो सकता है, वहाँ सज्जन का भी गला काटा जा सकता है, शास्त्र द्वारा जहाँ रोगी को बचाया जा सकता है, वहाँ मूढ़ वैद्य मार भी सकता है। इसलिये चिकित्सा के लिये वैद्य को अपनी बुद्धि को सदा स्वच्छ रखना चाहिये ॥२०॥ विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया । यस्यैते षड्गुणास्तस्य न साध्यमतिवर्तते ॥ २१ ॥ विद्या मतिः कर्मदृष्टिरभ्यासः सिद्धिराश्रयः । वैद्यशब्दाभिनिष्पत्तावलमेकैकमप्यतः ॥ २२ ॥ यस्य त्वेते गुणाः सर्वे सन्ति विद्यादयः शुभाः । स वैद्यशब्दं सद्भूतमर्हन् प्राणिसुखप्रदः ॥ २३ ॥ ( विद्या ) आयुर्वेद विद्या, ( वितर्कः ) शास्त्रार्थ मूलक ऊहापोह, (विज्ञान) बहुत शास्त्र के ज्ञान से विज्ञत्व, ( तत्परता ) लग्न, ( क्रिया ) चिकित्साकुशलता जिस वैद्य में ये उपरोक्त छः गुण हैं उसके लिये कोई भी व्याधि असाध्य नहीं है। आयुर्वेद विद्या, विशुद्ध बुद्धि, दृष्ट चिकित्सा, चिकित्सा कार्य में अभ्यास, अनेक रोगियों को आरोग्य युक्त करने में सफलता, सद्गुरु का आश्रय, एक एक भी गुण वैद्य पद प्राप्तकराने में समर्थ है। परन्तु जिस पुरुष में