चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १०] सूत्रस्थानम् १२३ आदि सब गुण होते हैं, वही सच्चे अर्थों में 'वैद्य' कहला सकता है। वही प्राणियों के लिये सुख देने वाला होता है ॥ २१-२३ ॥ शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिरात्मनः । ताभ्यां भिषक्सुयुक्ताभ्यां चिकित्सान्नापराध्यति ॥ २४ ॥ चिकित्सिते त्रयः पादा यस्माद्वैद्यव्यपाश्रयाः । तस्मात्प्रयत्नमातिष्ठेद्भिषक् स्वगुणसंपदि ॥ २५ ॥ मैत्री कारुण्यमार्तेषु, शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम् । प्रकृतिस्थेषु भूतेषु, वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधेति ॥ २६ ॥ आयुर्वेद शास्त्र तो प्रकाश करने के लिये ज्योति है और अपनी बुद्धि आंख है। इन दोनों को मिलाकर ठीक तरह से प्रयोग करके चिकित्सक भूल नहीं करता। चिकित्सा के तीन चरण रोगी, परिचारक और द्रव्य वैद्य पर ही आश्रित हैं। इसलिये अपने गुणों को विशेष रूप से प्राप्त करने में वैद्य को प्रयत्नवान् रहना चाहिये । वैद्य का व्यवहार चार प्रकार का है। रोग से पीडित पुरुष में मित्रता और उन पर दया का भाव; साध्य रोगी में स्नेहभाव, मरणासन्न रोगी में उपेक्षा बुद्धि रखना ॥ २४-२६ ॥ तत्र श्लोकौ- भिषग्जितं चतुष्पादं पादः पादश्चतुर्गुणः । भिषक् प्रधानं पादेभ्यो यस्माद्वैद्यस्तु यद्गुणः ॥ २७ ॥ ज्ञानानि बुद्धिर्ब्राह्मी च भिषजां या चतुर्विधा । सर्वमेतच्चतुष्पादे खुड्डाके संप्रकाशितम् ॥ २८ ॥ चिकित्सा के चार चरण प्रत्येक चरण के चार-चार गुण, सब चरणों में प्रधान 'भिषक्' है, क्यों प्रधान है ? वैद्य के गुण, वैद्यों की चार प्रकार की बुद्धि और ब्राह्मी बुद्धि यह सब 'खुड्डाक चतुष्पाद' अध्याय में कह दिया है॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के खुड्डाकचतुष्पादो नाम नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥ दशमोऽध्यायः । ॐ अथातो महाचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥