भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१२४ चरकसंहिता [ अ० १०

इस के अनन्तर 'महाचतुष्पाद' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति भिषजो भाषन्ते, यदुक्तं पूर्वा- ध्याये षोडशगुणमिति, तद्भेषजं युक्तियुक्तमलमारोग्यायति भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः ॥ ३ ॥ चार चरण और सोलह कलायुक्त चिकित्सा होती है ऐसा वैद्य कहते हैं । पूर्व के ( खुड्डाक-चतुष्पाद ) अध्याय में जो सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा का उपदेश किया है उसी चिकित्सा को युक्ति पूर्वक प्रयोग करने से आरोग्यता मिलती है ऐसा पुनर्वसु आत्रेय ने कहा है ॥ ३ ॥ नेति मैत्रेयः । किं कारणम् , दृश्यन्ते ह्यातुराः केचिदुपकरणवन्तश्च परिचारकसंपन्नाश्चाऽऽत्मवन्तश्च कुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठ- मानास्तथायुक्ताश्चापरे म्रियमाणास्तस्माद्भेषजमकिंचित्करं भवति । तद्यथा श्वभ्रे सरसि च प्रसिक्तमल्पमुदकं नद्यां वा स्यन्दमानायां पांसुधाने वा पांसुमुष्टिः प्रकीर्ण इति । तथाऽपरे दृश्यन्तेऽनुपकरणाश्चा- परिचारकाश्चानात्मवन्तश्चाकुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठमानाः, तथायुक्ता म्रियमाणाश्चापरे । यतश्च प्रतिकुर्वन् सिद्ध्यति प्रतिकुर्वन् म्रियते, अप्रतिकुर्वन् सिध्यत्यप्रतिकुर्वन् म्रियते ; ततश्चिन्त्यते भेषज- मभेषजेनाविशिष्टमिति ॥ ४ ॥ 'मैत्रेय' के विचार में यह ठीक नहीं, क्योंकि कुछ रोगी जिन को सब प्रकार के साधन प्राप्त हैं, जिनके सेवक भी हैं, जो संयमी, जितेन्द्रिय भी हैं, और चतुर वैद्य उनकी चिकित्सा करते हैं, वे अच्छे ( स्वस्थ ) होते देखे जाते हैं । इस के सिवाय उपरोक्त सब कुछ होते हुए भी कुछ रोगी मरते हुए भी देखे जाते हैं । इसलिये कहते हैं कि सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा कुछ फलदायक नहीं । जिस प्रकार एक बड़े भारी गढ़े या तालाब में थोड़ा सा पानी डालने पर कुछ लाभ नहीं होता और जिस प्रकार बहती हुई नदी में फेंकी हुई धूलि की मुट्ठी निरर्थक होती है, वह पानी में बह जाती है और जिस प्रकार रेत के बहुत बड़े ढेर में डाली हुई रेत की एक मुट्ठी का कुछ लाभ नहीं, इसी प्रकार शुभ कर्मवाले रोगी में चिकित्सा का कोई लाभ नहीं । कुछ रोगी साधनों के बिना ही, सेवकों से रहित, अजितेन्द्रिय, अपथ्यसेवी, और मूढ़ वैद्यों से चिकित्सा कराने पर भी स्वस्थ होते हुये देखे जाते हैं, एवं कुछ ( इस उपरोक्त अवस्था में ) मरते हुए भी देखे जाते (सोलह गुणों से युक्त) चिकित्सा करने पर आरोग्ययुक्त स्वस्थ हो जाते हैं

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