चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) सप्तमोऽध्यायः ( पृ० ४६३–४७२ ) उन्मादनिदानम्—पांच प्रकार के उन्माद। उन्माद का लक्षण। उन्माद के पूर्वरूप वातोन्माद के लक्षण। पित्तजन्य उन्माद के लक्षण। सान्नि- पातिक उन्माद। उन्माद की चिकित्सा। आगन्तुज उन्माद। उन्माद का प्रारम्भ। आगन्तुज के लक्षण। आघात काल। उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन। उन्माद के भेद। उपसंहार। अष्टमोऽध्यायः ( पृ० ४७२–४८० ) अपस्मारनिदानम्—चार प्रकार का अपस्मार। निदान और सम्प्राप्ति। अपस्मार का लक्षण। अपस्मार के पूर्व- रूप वातजन्य अपस्मार के लक्षण। पित्तजन्य अपस्मार। कफजन्य अपस्मार। सान्निपातिक अपस्मार। चिकित्सा सूत्र। भिन्न २ रोगों की उत्पत्ति। साध्य और असाध्य। रोग ज्ञान का फल। एक रोग के कारण दूसरा रोग। शुद्ध प्रयोग का लक्षण। कारण भेद। लक्षण भेद। चिकित्सा विधान। सुखसाध्य और कृच्छ्रसाध्य। साध्य और असाध्य। उपसंहार। इति निदानस्थानम् ॥ विमानस्थानम् प्रथमोऽध्यायः ( पृ० ४८१–४६४ ) रसविमानम्—विमानस्थान का प्रयोजन। छः रस तीन दोष। रसों के प्रभाव। द्रव्य के प्रभाव। सात्म्य। सात्म्य के भेद। प्रवर मध्यम और अवर। आहार विधि उसके आठ अंग। करण। संयोग। राशि। देश। काल। उपयोग संस्था। उपयोक्ता। आहार विधि। आहार के सद्गुणों का उपदेश। उपसंहार। द्वितीयोऽध्यायः ( पृ० ४६४–५०१ ) त्रिविधकुक्षीयं विमानम्—पेट में तीन भाग। आहार की अमात्रा, हीन मात्रा, अधिक मात्रा। उनके दोष आहार की अति मात्रा से हानियां। आमप्रदोष के दो प्रकार-विषूचिका और अलसक। अलसक का स्वरूप। असाध्य अलसक। साध्य अलसक की चिकित्सा। विषूचिका का उपाय। आम प्रदोष में औषध का प्रयोग। अपतर्पण का प्रयोग। अन्न पाचन के सम्बन्ध में अग्निवेश का प्रश्न और आत्रेय पुनर्वसु का उत्तर। उपसंहार। तृतीयोऽध्यायः ( पृ० ५०१–५१६ ) जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानम्— जनपदनाशक रोग के प्रतीकार का उप- देश। जनपदनाशक रोग के फैलने के कारण प्रश्न और उत्तर। आरोग्यनाशक वायु के लक्षण। रोगकारी जल के लक्षण। नाशकारी रोगों के पूर्व, देश में उपस्थित लक्षण। विपरीत ऋतु के लक्षणों वाला काल। आयु-रक्षक उपाय। वायु आदि में विगुणता उत्पन्न होने का