भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पर स्नेह लगाकर स्वेद लेना चाहिये। इस प्रकार सुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है ॥ ५२-५४ ॥ य एवाश्मघनस्वेद-विधिर्भूभौ स एव तु । प्रशस्तायां निवातायां समायामुपदिश्यते ॥ ५५ ॥ (१०) भू-स्वेद विधि—जो विधि अश्मघन स्वेद की है, वही भूस्वेद की है। इस स्वेद के लिये भूमि उत्तम, वायु रहित तथा समान हो ऊंची-नीची नहीं होनी चाहिये ॥५५॥ कुम्भीं वातहर-क्वाथ-पूर्णां भूमौ निखानयेत् । अर्धभागं त्रिभागं वा शयनं तत्र चोपरि ॥ ५६ ॥ ध्यारयेदासनं वाऽपि नातिसान्द्रपरिच्छदम् । अथ कुम्भ्यां सुसन्तप्तान् प्रक्षिपेदयसो गुडान् ॥ ५७ ॥ पाषाणांश्चोष्मणा तेन ततःस्थः स्विद्यति ना सुखम् । सुसंवृताङ्गः स्वभ्यक्तः स्नेहैरनिलनाशनैः ॥ ५८ ॥ (११) कुम्भी-स्वेद विधि—घड़े को वातहर देवदारु आदि के क्वाथ से भरकर भूमि में आधा या तिहाई भाग गाड़ देना चाहिये । इसके ऊपर एक खाट बिछा दे । खाट के ऊपर बहुत गहरा मोटा कपड़ा न बिछाना चाहिये । फिर लोहे के गोले, या पत्थरों को खूब गरम करके भूमि में या गड़ी और वात हर क्वाथ से भरी कुम्भी (घड़े) में गिरा दे । इनकी गरमी से, शय्या के ऊपर अंगों को लपेट कर लेटे हुए, शरीर पर वातनाशक स्नेह का मर्दन किये हुए पुरुष को सुखपूर्वक स्वेदन होता है ॥ ५६-५८ ॥ कूपं शयनविस्तारं द्विगुणं चापि वेधतः । देशे निवाते शस्ते च कुर्यादन्तः सुमार्जितम् ॥ ५६ ॥ हस्त्यश्व-गो-खरोष्ट्राणां करीषैर्दग्धपूरिते । स्ववच्छन्नः सुसंस्तीर्णेऽभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ ६० ॥ (१२) कूप-स्वेद—जितनी जगह पर खाट बिछती हो, उतने स्थान पर शय्या के बराबर लम्बा, चौड़ा एक गड्डा खोदे । इस गड्ढे की गहराई दुगनी हो। इस कुप को वायु रहित स्थान पर बनावे इस कुप को अन्दर भली प्रकार लेप कर साफ स्वच्छ कर लेना चाहिये । इस गत्त में हाथी, घोड़े आदि के शुष्क मल (गोटों को) को डाल कर जला देना चाहिये । जब धुंआ निकलना बन्द हो जाय तब इस कूप के ऊपर चारपाई बिछा कर कोई वस्त्र इस पर बिछाकर, शरीर पर वातहर तैल मर्दन करके, व्याघ्रचर्म, मृगछाला, कम्बल आदि ओढ़कर लेटने से सुख पूर्वक स्वेद हो जाता है ॥५९-६०॥